शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

धर्म आधारित आरक्षण भारत के लिए विष का प्याला

भारत में सत्ता हस्तांतरण के पश्चात आरक्षण उन वर्गो को दिया गया था जो बेहद दबे और कमजोर जाति से संबंध रखते थे तथा आरक्षण के बिना उनका आगे बढ़ना असम्भव था । ग्रामीण और उपनगरीय क्षेत्रों में तो उनकी परछाई तक प्रदूषित मानी जाती थी । मूल रूप से इसे अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए 10 वर्षो के लिए रखा गया था । मगर यह आरक्षण न केवल 64 वर्षो से चला आ रहा है , बल्कि विभिन्न समुदायों में विद्वेष पैदा करने के लिए फैलता भी जा रहा है । इसमें उन समुदायों की आवश्यकता से अधिक वोट बैंक की राजनीति का हाथ है ।
अब ये आरक्षण विकराल रूप लेने लगा है । हिन्दू समाज की गुर्जर , कुम्हार आदि जातियों के साथ - साथ मुस्लिम व ईसाई समाज भी धार्मिक आधार पर आरक्षण मांगने लगे है । आखिर आरक्षण कब समाप्त होगा ? क्या यह देश को अखंड व सुरक्षित रहने देगा ? देश के अन्य वर्ग , जाति और समुदाय कब तक चुप रहेंगे ? एक दिन वह भी आरक्षण की मांग करेंगे । सामान्य कहे जाने वाली जातियां भी आरक्षण की मांग करेंगी । क्योंकि उनके लिए तो कुछ भी नहीं बचता , क्योंकि आरक्षित वर्ग आरक्षण के कारण तो अपना अधिकार लेता ही है । सामान्य वर्ग के हिस्से में भी भागीदार हो जाता है , ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या सामान्य वर्ग में गरीब व बेसहारा नहीं है ? या तो सरकार हर जाति और समुदाय के गरीब परिवार के युवाओं को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दें या फिर आरक्षण को समाप्त कर दें । वरना आरक्षण पाओ और आबादी बढ़ाओं ही चलता रहेंगा । देश की चिन्ता कोई नहीं करेगा ।
25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेदकर ने कहा था कि जातियां राष्ट्रविरोधी है । पहला , इसलिए कि ये सामाजिक जीवन में अलगाव लाती है । ये राष्ट्रविरोधी है क्योंकि ये समुदायों में ईष्या तथा घृणा पैदा करती है । यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनाना चाहते है तो हमें इन सभी कठिनाईयों से पार पाना होगा । भाईचारा होगा तो ही राष्ट्र बनेगा ।
पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर का कहना है कि जाति के आधार पर आरक्षण तथा अन्य उपाय समाज तथा राष्ट्रहित में नहीं है । उन्होंने कहा कि यह अत्यन्त गरीब तथा सभी समुदायों के जरूरतमंद लोगों को मिलना चाहिए ।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सबको समान अवसर देने का वचन देता है तो अनुच्छेद 15 ( 1 ) के द्वारा यह विश्वास दिलाया गया है कि जाति , धर्म , संस्कृति या लिंग के आधार पर राज्य किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा । मुसलमान व ईसाई आदि अल्पसंख्यकों को भी बहुसंख्यकों के बराबर स्वतंत्रता व रोजगार का अधिकार प्राप्त है । भारत का संविधान स्पष्ट शब्दों में धर्म आधारित आरक्षण की मनाही करता है । तो भी सन 2004 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन राजशेखर रेड्डी की सरकार ने संविधान की मूल भावना के विरूद्ध अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण हेतु धर्म के आधार पर विभाजित भारत के इतिहास में धर्म के आधार पर आरक्षण का एक नया पन्ना जोड़ा । जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ गौर कर रही है । अल्पसंख्यक वोटों के भूखे अन्य राजनीतिक दल भी इसका अनुकरण करने के लिए लालायित है ।
मुस्लिमों के लिए आरक्षण वस्तुतः उस मर्ज का इलाज ही नहीं है , जिससे मुस्लिम समुदाय ग्रस्त है । विडंबना यह है कि सेक्युलर दल अवसरवादी राजनीति के कारण उस मानसिकता को स्वीकारना नहीं चाहते । बुर्का प्रथा , बहुविवाह , मदरसा शिक्षा , जनसंख्या अनियंत्रण जैसी समस्याओं को दूर किए बगैर मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने की कवायद एक छलावा मात्र है । इस प्रतियोगी युग में भी अधिकांश मुस्लिम नेताओं द्वारा मदरसों की अरबी - फारसी शिक्षा को ही यथेष्ट माना जाना तथा अपने समुदाय के लोगों को जनसंख्या नियंत्रण के तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित न करना क्या दर्शाता है । वे अपनी बढ़ी आबादी के बल पर राजनीतिक दलों के साथ ब्लैकमेलिंग की स्थिति में है ।
हिन्दू और मुसलमानों की साक्षरता दर के साथ जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना करें तो मुस्लिमों के पिछड़ेपन का भेद खुल जाता है । केरल की औसत साक्षरता दर 90.9 प्रतिशत है । मुस्लिम साक्षरता दर 89.4 प्रतिशत होने के बावजूद जनसंख्या की वृद्धि दर 36 प्रतिशत है , जबकि हिन्दुओं में यह दर 20 प्रतिशत है । महाराष्ट्र में मुस्लिम साक्षरता दर 78 प्रतिशत होने के साथ ही जनसंख्या वृद्धि दर हिन्दुओं की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है । छत्तीसगढ़ में साक्षरता 82.5 प्रतिशत तो जनसंख्या दर हिन्दुओं की तुलना में 37 प्रतिशत अधिक है । संसाधन सीमित हो और उपभोक्ता असीमित तो कैसी स्थिति होगी ?
अल्पसंख्यक बोट बटोरने के लिए आरक्षण को एक हथियार के रूप में प्रयुक्त कर रही राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को खुले मस्तिष्क से धर्म आधारित आरक्षण के दीर्घकालिक परिणामों पर सोचना चाहिए । धर्म के आधार पर आरक्षण कालांतरण में राज्य व केन्द्र स्तर पर अलग - अलग क्षेत्रों की मांग का भी मार्ग प्रशस्त कर सकता है । जो भारत के लिए विष का प्याला सिद्ध होगा । जाति और धर्म आधारित आरक्षण समाज में मतभेद बढ़ाता है और राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का काम करता है ।
दूसरी ओर आर्थिक आधार पर आधारित आरक्षण कोई फूट नहीं डालता और विभिन्न समुदायों में कोई वैमनस्य नहीं बढ़ाता । अभी भी आरक्षण का आधार आर्थिक करने का एक अवसर है , इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाई जा सकती है । यदि धर्म आधारित आरक्षण दिया गया तो इसके परिणाम राष्ट्रीय एकता के लिए विष के समान घातक सिद्ध होगे ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत'

6 टिप्‍पणियां:

  1. अल्पसंख्यकों को चाहिए कि वे अपने स्वाभिमान को जगाएं। अपने निजी हित से ऊपर उठकर राष्ट्र के बारे में सोचें वे कमज़ोर नहीं हैं, मोहताज नहीं हैं जिन्हें भाँती-भाँती के आरक्षण और विशेष सुविधाओं की ज़रुरत हो। उन्हें अपने ज्ञान और शिक्षा के आधार पर उपलब्धियां हासिल करनी चाहिए अन्य भारतीयों की तरह।

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  2. विश्वजीत भाई,
    मुझे तो यही लगता है कि जाति आधारित आरक्षण का आज तक चलते रहना दरअसल भेदभाव का सबसे बड़ा कारण बन चूका है| ये कांग्रेसी तो अंग्रेजों से भी आगे निकले| अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाया और इन काले अंग्रेजों ने तो जाति आधारित आरक्षण की आग लगाकर न केवल हिन्दुओं के घर जलाए अपितु हिन्दुओं को ही हिन्दुओं का शत्रु बना डाला| उस अत्याचार का बहाना लेकर जिसका इतिहास में भी कभी अस्तित्व न था दलितों को सवर्णों से लड़ाया| हिन्दुओं के मन में उनके धर्म गुरु ब्राह्मणों के लिए यह कह कर नफरत भर दी कि ये आपसे नफरत करते हैं और हिन्दू धर्म के खुद ठेकेदार बने बैठे हैं|
    दिव्या दीदी से पूर्णत: सहमत| भीख में मिली शोहरत व पद का त्याग अल्पसंख्यकों को कर देना चाहिए| इस पद का कोई महत्त्व नहीं जिसे पाने के लिए आपकी योग्यता नहीं जाति देखी जाती हो|

    विश्वजीत भाई, जाति आधारित आरक्षण पर आपकी सटीक लेखनी कमाल कर गयी|
    धन्यवाद|

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  3. इस लानत रुपी आरक्षण को हट कर अगर इस की जगह शिक्षा जरुरी कर दी जाये ओर वो भी मुफ़त, साथ मे किताबे कापियां भी मुफ़त तो देखे यह पिछला वर्ग कैसे तरक्की करता हे, लेकिन इस आरक्षण का लाभ इन लोगो को कभी नही होगा, ओर यह नेता खुब मजे लेगे ओर एक दिन देश बिखर जायेगा... अभी तो राज्यओ के टुकडे हो रहे हे फ़िर देश के...........

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  4. मैँ आपके इस लेख का समर्थन करता हूँ क्योँकि चाहे जिस भी वर्ग/मुद्दे की बात/राय आपने लिखी है वह देखी जाये तो जमीनी हकीकत पर सच ही है।

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  5. आरक्षण का बोझ हम कब तक अपने कन्धों पर ढोते रहेंगे? आरक्षण का लाभ केवल कुछ गिने चुने लोगों तक ही सीमित है. अगर इस वर्ग की उन्नति करनी है तो इन्हें शिक्षा में अधिक से अधिक सुविधाएँ दें, जिससे ये आगे बढ़ सकें. इसके बाद नौकरियों में आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा. लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते हुए ऐसा होने की कोई संभावना नहीं दिखायी देती.

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  6. वोट बेंक से आगे ये राजनेता सोच नहीं पाते ... और जनता वो बिचारी तो आज रोज मर्रा में ही फंसी हुयी है ... इस आरक्षण का लाभ बस नेता लेते अहिं जनता को बरगलाने के लिए ... अपना मोहरा न्बनाने के लिए ...

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