रविवार, 13 नवंबर 2011

बाल दिवस : मेरे देश के बच्चों के आदर्श नहीं हो सकते नेहरू ?




ये है सच जवाहर लाल नेहरू का जो अपनी बेटी समान लड़कियों को भी अपनी अय्याशी का साधन समझता रहा । इसके जैसे निर्लज्ज अय्याश पुरूष को मैं क्या बच्चे भी स्वीकारने को तैयार नहीं कि इसे चाचा कहा जाये ।
जब स्वतंत्रता के संघर्ष में सत्ता का हस्तांतरण हुआ तो सारा श्रेय कांग्रेस को मिला । प्रधानमंत्री पद के चुनाव में कुल 15 वोटों में से 14 वोट सरदार पटेल के पक्ष में और 1 वोट नेहरू के पक्ष में पड़ने के बाद भी नेहरू गांधी जी की कृपा से देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने । लेकिन 1955 में " ओह दैट आफुल ओल्ड हिपोक्रेट " Oh, that awful old hypocrite - ओह ! वह ( गांधी ) भयंकर ढोंगी बुड्ढा कहकर नेहरू ने अपने प्रति किये गये गांधी के महान त्याग को अपमानित कर दिया ।
विदेश में पढ़ा एक व्यक्ति जो भारत की सनातन संस्कृति से अनजान था । जो अपने को हिन्दू कहलाने में अपमान समझता था । जो पराई स्त्री के चक्कर में इतना गिर सकता है कि जिसका कोई चरित्र ही नहीं हो , जो उन्मुक्त रूप से एक औरत के साथ सिगरेट पीता दिखाई देता है । ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन को अगर हमारी सरकार बाल दिवस के रूप में मनाती है , विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यक्रम करती है और कहती है इसने प्रेरणा ले ? अगर हमारे देश की आने वाली पीढ़ी इसके पद चिन्हों पर चलने लगे तो भारत का भविष्य अंधकारमय होगा ।
आज देश में जो आतंकवाद , संप्रदायवाद की समस्या है । कश्मीर की समस्या , राष्ट्र भाषा हिन्दी की समस्या और चीन तथा पाकिस्तान द्वारा भारत की भूमि पर अतिक्रमण की समस्या है । इन सभी समस्याओं के मुख्य उत्तरदायी जवाहर लाल नेहरू है , जिन्हें भारत सरकार चाचा नेहरू कहती है ?
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

8 टिप्‍पणियां:

  1. क्रांतिवीर खुदीराम बोस का स्मारक बनाने की योजना कानपुर के युवकों ने बना ली और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को इसके उद्घाटन के लिए आमन्त्रित किया । खुदीराम बोस का बलिदान अनेक युवकों के लिये स्फूर्तिदायक था । उनके पीछे असंख्यक युवक स्वतंत्रता - यज्ञ में आत्मार्पण करने के लिये आगे आये । इस प्रकार के अनेक क्रांतिकारियों के त्याग की कोई सीमा नहीं थी । नेहरू का क्रोध यह देखकर निरंकुश हो गया कि खुदीराम बोस जैसे एक शस्त्राचारी युवक के स्मारक का उद्घाटन करने के लिये उनके जैसे गांधी के वारिस को बुलाने का साहस इन युवकों ने क्यों किया । उन्होंने उन युवकों को फटकारा और कहा - " अत्याचारी मार्ग का जिसने आधार लिया , उसके स्मारक के उद्घाटन को मैं नहीं आऊँगा । " ( देखें : लाल किले की यादें , लेखक गोपाल गोडसे , दैनिक सनातन प्रभात 02 - 12 - 2007 )

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  2. .

    Really i wonder why children's day is celebrated in his name. Very unfortunate indeed.

    I fully agree with your views.

    .

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  3. यहाँ क्या कहें?…कई बातें संदेह लायक हैं…और गोपाल गोडसे से कैसे उम्मीद करें कि वे सच बोलेंगे…छोड़िए बहस होने लगेगी…नेहरु इतने भी गए-गुजरे नहीं थे। कहिए तो भगतसिंह का लिखा है उनके ऊपर, लगाएँ, अपने यहाँ…

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  4. बार बार एक सवाल उठता है कि क्या नेहरू अकेले इतने शक्तिशाली थे कि सब बुरा काम अकेले कर गए और लोग थे कहाँ?…अकेले कोई सब कुछ कर जाए, मैं नहीं मान सकता…

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    1. aap kuch jyada dikat mehsus kr rhe h , gopal ji ko apse certificate lene ki jrurat nhi h

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  5. प्रिय भाई चन्दन कुमार मिश्र जी मन में सवाल उठना स्वभाविक है कि वे इतना काम अकेले कैसे कर गये । नेहरू जी अकेले नहीं थे , उनके गांधी जी और उनके समूह का विशेष स्नेह तथा सहयोग प्राप्त था । इसीलिए वे इतना कुछ कर पाएँ ।
    उदाहरणार्थ वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी है । आज सोनिया कांग्रेस का पर्यावाची हो गई है । कांग्रेस पार्टी आज सोनिया के किसी भी आदेश को बिना सोचे विचारे मान लेती है ? क्या सोनिया की इच्छा के विरूद्ध कांग्रेस पार्टी कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है ?

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  6. प्रिय भाई चन्दन कुमार मिश्र जी मन में सवाल उठना स्वभाविक है कि वे इतना काम अकेले कैसे कर गये । नेहरू जी अकेले नहीं थे , उनके गांधी जी और उनके समूह का विशेष स्नेह तथा सहयोग प्राप्त था । इसीलिए वे इतना कुछ कर पाएँ ।
    उदाहरणार्थ वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गांधी है । आज सोनिया कांग्रेस का पर्यावाची हो गई है । कांग्रेस पार्टी आज सोनिया के किसी भी आदेश को बिना सोचे विचारे मान लेती है ? क्या सोनिया की इच्छा के विरूद्ध कांग्रेस पार्टी कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती है ?

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  7. प्रिय भाई चन्दन कुमार मिश्र जी शक्ति सोनिया में नहीं है बल्कि उसके समर्थकों में है जिनके बल पर वह शक्तिशाली बनी है । ऐसी ही स्थिति गांधी - नेहरू के समय में थी ।

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