गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एको ॐकार सतिनामु ...


रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रवणः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरूषं नृषु ।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते है ' हे अर्जुन ! जल में रस मैं हूँ । चन्द्रमा तथा सूर्य में प्रकाश मैं हूँ । संपूर्ण वेदों में ॐकार मैं हूँ । आकाश में शब्द और पुरूषों में पुरूषत्व मैं हूँ । '
( श्रीमद्भगवद्गीता : 7.8 )
किसी भी जाति का , किसी भी देश , मत या संप्रदाय का बालक हो , जब वह पैदा होता है तब पहली ध्वनि ' ॐ ... आ ... ॐ ... आ ... ' कहाँ से आती है ? उसकी ध्वनि इसी ॐकार से मिलती है । ॐ अनहद्नाद है , परम संगीत है , सृष्टि के सभी स्वर इसमें पिरोए गये है । इसी से उनका जन्म हुआ है , इसी से उनको जीवन मिलता है और इसी में उन्हें लय होना है । ॐ सृष्टि की सभी ऊर्जाओं का परमस्रोत है । ॐ ध्यान बीज है । इसके सुदीर्घ ध्यान से सृष्टि के सभी रहस्य उजागर हो जाते है । ॐ के नाद का , ध्वनि का महत्व केवल सनातन धर्म या वैदिकों में ही नहीं बल्कि जैन , बौद्ध , सिक्ख आदि सभी में है । ईसाइयों का ' आमेन ' और इस्लाम का ' आमीन ' भी ॐ का ही रूप है ।
ॐ शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है । अ + उ + म् = ओम् । ॐ का ' अ ' कार स्थूल जगत का आधार है । ' उ ' कार सूक्ष्म जगत का आधार है । ' म् ' कार कारक जगत का आधार है । जो इन तीनो जगत से प्रभावित नहीं होता बल्कि तीनों जगत जिससे सत्ता - सफूर्ति लेते है फिर भी जिसमें तिलभर भी फर्क नहीं पड़ता , उस परमात्मा का द्योतक ॐ है ।
ॐ आत्मिक बल देता है । ॐ के उच्चारण से जीवनशक्ति ऊर्ध्वगामी है । इसके सात बार के उच्चारण से शरीर के रोग के कीटाणु दूर होने लगते है तथा चित्त से हताशा - निराशा भी दूर होती है । यही कारण है कि प्राचीन ऋर्षि - मुनि , वैज्ञानिकों ने सभी मन्त्रों के आगे ॐ जोड़ा है ।
एक बार सद्गुरू नानक नदी में गये और तीन दिन तक डूबे रहे , खो गये । फिर बाहर आये । वे बाहर की सरिता में सरिता में नहीं , वरन् अन्तर्मुखी वृत्तियों की सरिता में खो गये थे । नानकजी ध्यानमग्न हो गये थे । वे तीन दिन तक अन्तरात्मा के ध्यान में डूबे थे और तीन दिन बाद जब जगे , तब उनका पहला वचन था : एको ॐकार ... परमात्मा एक है ।
एको ॐकार सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरू ।
अकाल मूरति अजूनि सैभं गुरू प्रसादी ।।
आदि सचु जुगादि सचु ।
है भी सचु नानक होसी भी सचु ।।
एको ॐकार : परमात्मा एक है ।
सतिनामु : वही सत् है ।
करता पुरखु : वही प्रकृति को सत्ता देता है ।
निरभउ : वह निर्भय है ।
निरवैरू : उसका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है ।
अकाल मूर्ति : वहाँ काल की गति नहीं है । काल संसार की सब वस्तुओं को खा जाता है , निगल जाता है , आकृतियों को नष्ट कर देता है लेकिन वह परमात्मा आकृति से परे है , निराकार सत्ता है ।
अजूनि : वह योनि में नहीं आता अर्थात अजन्मा है ।
सैभं : वह स्वयंभू है ।
गुर प्रसादि : उस परमात्मतत्व का जिन्होंने अनुभव किया हो ऐसे गुरूओं की जब कृपा बरसती है तब प्रसादरूप में वह मिलता है । आत्मतत्व की अनुभूति के रूप में वह मिलता है ।
आदि सचु जुगादि सचु : जो आदि में सत् था , जो युगों से सत् था ... युग बदल गये , समय बदल गया , परिस्थितियाँ बदल गई , मनुष्य बदल गये , मनुष्य के मन , बुद्धि , विचार बदल गये फिर भी वह नहीं बदला ।
है भी सचु नानक ! होसी भी सचु : जो युगों से सत् था , अभी - भी सत् है और बाद में भी सत् रहेगा , उसी को नानक ने एको ॐकार सतिनामु ... कहा है । उस अकाल पुरूष को जानने पर मनुष्य को कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता ।
ॐ का पहला अक्षर ' अ ' नाभि में कम्पन करता है , दूसरा अक्षर ' उ ' हृदय में कम्पन करता है और तीसरा अक्षर ' म् ' दोनों भोहों के मध्य आज्ञाचक्र में कम्पन करता है । ओम् ध्वनि के उच्चारण करने से समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ , कर्मेन्द्रियाँ और मन एकाग्र व अर्न्तमुखी हो जाता है तथा प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती है । ॐ ध्वनि का दीर्घकालिक अभ्यास समाधि के दिव्य नाद को भी प्राप्त करा देता है ।
सद्गुरू नानकदेव ज्यन्ति कार्तिक पूर्णिमा की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ ।
ॐ लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

1 टिप्पणी:

  1. विश्वजीत भाई, बेहतरीन प्रस्तुति...
    ॐ के अर्थ को यदि संसार जान ले तो dukh का कारण ही क्या है... प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ सत्ता भी इसी पर टिकी है| तभी तो नानक देव ने भी एको ॐकार कहा|
    ॐ शब्द में वह शक्ति है कि दीवारों में कैद कोई व्यक्ति इसका उच्चारण करे तो वह ध्वनि दीवारों को चीर दे|
    साधुवाद

    कुछ दिनों से लापता था, किन्तु अब निरंतर उपस्थिति दर्ज करवाऊंगा|

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