रविवार, 24 जुलाई 2011

गांधीजी और ईसाईयत भाग - एक


मोहनदास गांधी जी के पिता श्री करमचन्द गांधी जी एक धार्मिक स्वभाव के जिज्ञासु व्यक्ति थे तथा वह प्रायः सभी धर्मो , मतों और सम्प्रदायों के लोगों से धार्मिक चर्चाएँ किया करते थे जिसका प्रभाव मोहनदास गांधी पर भी पडा ।
अपनी साहित्य में गांधीजी लिखते है - " इन सब चर्चाओं के कारण मुझमें सभी धर्मो के प्रति सहिष्णुता आ गयी , केवल ईसाईयत इसका एक अपवाद रही । उसके प्रति मेरे मन में अरूचि पैदा हो गयी । उन दिनों ईसाई मिशनरी हाईस्कूल के पास एक नुक्कड पर ईसाई लोग खडे हो जाते और हिन्दुओं एवं हिन्दू देवी - देवताओं पर गालियाँ उडेलते हुए अपने पंथ का प्रचार करते । उन्हीं दिनों मैंने सुना कि एक प्रसिद्ध हिन्दू व्यक्ति अपना धर्म बदलकर ईसाई बन गया है । शहर में चर्चा थी कि ' बपतिस्मा ' लेते समय उसे गोमांस खाना पडा , शराब पीनी पडी तथा अपनी वेशभूषा भी बदलनी पडी । वह हैट ( टोपी ) लगाने लगा अर्थात यूरोपियन वेशभूषा धारण करने लगा । मैंने सोचा - ' जो धर्म किसी को गोमांस खाने , शराब पीने और पहनावा बदलने को विवश करे वह धर्म कहे जाने योग्य नहीं है । ' मैंने यह भी सुना कि वह नया धर्मान्तरित व्यक्ति अपने पूर्वजों के धर्म तथा रहन - सहन को गाली देने लगा है । इन सब कारणों से मुझे ईसाईयत के प्रति घृणा हो गयी ।
मैंने ' जेनेसिस ' पढा किन्तु बाद के अध्यायों ने तो मुझे बरबस सुला ही दिया । नाममात्र के लिए बिना कुछ समझे तथा रस लिए मैंने उसके अन्य अध्यायों पर दृष्टि डाली । ' बुक ऑफ नम्बर्स ' तो मुझे बिल्कुल भी पसन्द नहीं आयी । हाँ , ' न्यू टेस्टामेन्ट ' के ' सरमन ऑन द माउण्ट ' में मुझे कहीं ' गीता ' से समानता नजर आयी । यदि कोई सच्चा ईसाई जीवन जीना चाहता है तो उसके लिए ईसाईयत का सार ' सरमन ऑन द माउण्ट ' में है परन्तु वैसी ईसाईयत का आचरण तो आज तक कहीं भी नहीं किया गया ।
इन पुस्तकों का यह तर्क कि - ' जीजस ही ईश्वर के एकमात्र अवतार या ईश्वर और मनुष्य के बीच में एकमात्र मध्यस्थता करने वाले है ' मुझे तनिक भी प्रभावित नहीं कर सका । मैं यह विश्वास कर पाने में असमर्थ था कि जीजस ही ईश्वर के एकमात्र पुत्र है । ' जीजस ईश्वर के इकलौते बेटे थे ' ऐसा कहना तो नास्तिकता है । जीजस के बलिदान की प्रशंसा की जा सकती है परन्तु उस बलिदान में दिव्य और रहस्यमय कुछ भी नहीं है । वह तो कष्ट को सहने का एक दृष्टांतमात्र है । मेरा विवेक इस बात को मानने के लिए भी तैयार नहीं था कि जीजस अपनी मृत्यु एवं रक्त के द्वारा संसार भर के पापों का बोझ अपने ऊपर लेकर सबका प्रायश्चित कर चुके है । मैं यह तनिक भी नहीं मानता कि कोई एक व्यक्ति दूसरे के पापों को धो सकता है , उसे मुक्ति दिला सकता है । ' एक अकेला व्यक्ति जीजस करोडों मनुष्यों के पापों के प्राश्चित के लिए मर गये तथा उनका उद्दार करने वाले हो गये ' यह विचार तो मैं स्वीकार कर ही नहीं सकता ।
मेरी धारणा है कि ईसा मसीह संसार के महान् शिक्षकों में से एक थे । ईसाई मजहब जिस अर्थ में उन्हें संसार का तारणहार समझता है उस अर्थ को मैं नहीं मानता । मैं यह भी नहीं मानता कि संसार भर में केवल ईसा ही देवत्व से विभूषित थे । दो हजार वर्ष पहले कोई व्यक्ति मर गया , उसी को ऐतिहासिक ईश्वर बताना तो विडम्बना है , घोखा है ।
ईसाई मिशनरियाँ जिस प्रकार से इन दिनों ( धर्मान्तरण का ) कार्य कर रही है , उस तरह के काम का कोई भी अवसर उन्हें स्वतंत्र भारत में नहीं दिया जाना चाहिए । ये मिशनरियाँ समस्त भारतवर्ष को नुकसान पहुँचा रही है । मानव परिवार में ऐसी एक चीज का होना एक दुःखद बात है । जब तक आप मिशनरी लोग गैर - ईसाईयों और भारतीयों को अन्धकार में भटकता हुआ मानोगे , तब तक स्वतंत्र भारत में आपके लिए कोई स्थान नहीं होगा । अगर मेरे हाथ में सत्ता हो और मैं कानून बना सकूँ तो तो मैं धर्मान्तरण का यह सारा धन्धा ही बन्द करा दूँ । जिन परिवारों में मिशनरियों की पैठ है उनके खान - पान , रहन - सहन तथा रीति - रिवाज तक में परिवर्तन हो गये है । आज भी हिन्दू धर्म की निन्दा जारी है । ईसाई मिशनों की दुकानों पर मरडॉक की पुस्तके बिकती है । इन पुस्तकों में हिन्दू धर्म की निन्दा के अलावा कुछ भी नहीं है ।
हिन्दू परिवार आप लोगों को अच्छा जीवन बीताने का न्यौता देते है । उसका यह अर्थ नहीं कि आप उन्हें ईसाई धर्म में दीक्षित करें । बडी - बडी समृद्ध ईसाई धर्म प्रचारक संस्थायें भारत की सच्ची सेवा तो तभी कर पायेंगी जब वे अपने मन को इस बात पर राजी कर लें कि - ' अपनी प्रवृत्तियाँ केवल मानव - दया से प्रेरित सेवाकार्य तक ही सीमित रखेंगे । ' सेवा की आड में भारत के भोले - भाले लोगों को ईसाई बनाने का उद्देश्य नहीं रखें । केवल लॉर्ड - लॉर्ड चिल्लाने से कोई ईसाई नहीं हो जायेगा । सच्चा ईसाई वह है जो भगवान के आदेशानुसार आचरण करे और यह कार्य एक ऐसा व्यक्ति भी कर सकता है जिसने कभी जीजस का नाम भी नहीं सुना हो ।
क्रमश ......

( गांधी वांगमय , ' My Experiments With Truth ' एवं हरिजन से संकलित )
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

1 टिप्पणी:

  1. आस्तिकों के लिए अच्छा लेख! यह लेख गाँधी जी की अच्छी सोच को रखता है। धन्यवाद लेकिन हम जैसे अनीश्वरवादियों को इससे क्या? सरमन आन द माउन्ट की बात ओशो ने कही थी। ओशो ने कहा था कि बाइबल में इस पाठ के अलावे सब कुछ अश्लील और कचरा है।

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