रविवार, 3 जुलाई 2011

क्रान्तिकारी सुखदेव का गांधी जी के नाम खुला पत्र



अत्यन्त सम्मानीय महात्मा जी आजकल के नए समाचारों से ज्ञात होता है कि आपने समझौते की परिचर्चा के बाद से क्रान्तिकारियों के नाम कई अपीलें निकाली है, जिनमें आपने उनसे कम से कम वर्तमान के लिए अपने क्रान्तिकारी आंदोलन रोक देने के लिए कहा है। वस्तुतः किसी आन्दोलन को रोक देने का काम कोई सिद्धांतिक या अपने वश की बात नहीं है, यह भिन्न - भिन्न अवसरों की आवश्यकताओं का विचार कर आन्दोलन के नेता अपना और अपनी नीति का परिवर्तन किया करते है। मेरा अनुमान है कि संधि के वार्तालाप के समय आप एक क्षण के लिए भी यह बात न भूले होगे कि यह समझौता कोई आखिरी समझौता नहीं हो सकता। मेरे विचार से इतना तो सभी समझदार व्यक्तियों ने समझ लिया होगा कि आपके सब सुधारो के मान लिए जाने पर भी देश का अंतिम लक्ष्य पूरा न हो पायेगा। कांग्रेस लाहौर घोषणानुसार स्वतंत्रता का युद्ध तब तक जारी रखने के लिए बाध्य है जब तक पूर्ण स्वाधीनता ना प्राप्त हो जाये। बीच की संधियाँ और समझौते विराम मात्र है, उपरोक्त सिद्धांत पर ही किसी प्रकार का समझौता या विराम संधि की कल्पना की जा सकती है। समझौते के लिए उपयुक्त अवसर का तथा शर्तो का विचार करना नेताओं का काम है। लाहौर के पूर्ण स्वतंत्रता वाले प्रस्ताव के होते हुए भी आपने अपना आंदोलन स्थगित कर देना उचित समझा तो भी वह प्रस्ताव ज्यो का त्यो बना है।
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के क्रांतिकारियों का ध्येय इस देश में समाजसत्ता प्रजातंत्र प्रणाली स्थापित करना है। इस ध्येय के मध्य में संशोधन की जरा भी गुजांईश नहीं है, वे तो जब तक अपना ध्येय व लक्ष्य पूर्ण नहीं हो जाता तब तक लडाई जारी रखने के लिए बाध्य है। परन्तु वे परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ अपनी युद्ध नीति बदलने के लिए तैयार अवश्य होगे। क्रांतिकारियों का युद्ध विभिन्न अवसरों पर भिन्न - भिन्न स्वरूप धारण कर लेता है । कभी वह प्रकट रूप तो कभी गुप्त रूप धारण कर लेता है, कभी केवल आंदोलन के रूप में होता है तो कभी जीवन - मृत्यु का भयानक संग्राम बन जाता है। ऐसी परिस्थितियों में क्रांतिकारियों के सामने अपना आंदोलन रोक देने के लिए कुछ विशेष कारणों का होना तो आवश्यक ही है। परन्तु आपने हम लोगो के सामने ऐसा कोई निश्चित कारण प्रकट नहीं किया जिस पर विचार कर हम अपना आंदोलन रोक दे। केवल भावुक अपीलों का क्रांतिवादी युद्ध में कोई विशेष महत्व नहीं होता। समझौता करने के कारण आपने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है जिसके फलस्वरूप आपके सब कैदी छूट गए है, पर क्रान्तिकारी कैदियों के बारे में आप क्या कहते हो ? सन 1915 के गदर पक्ष वाले कैदी अब भी जेलों में सड रहे है, यद्यपि उनकी सजाऐं पूरी हो चुकी है। लोदियों मार्शल ला के कैदी जीवित ही कब्रो में गडे हुए है, इसी प्रकार दर्जनों बब्बर अकाली कैदी जेल में यातना पा रहे है। देवगढ, काकोरी, महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केस, दिल्ली, चटगॉव, बम्बई, कलकत्ता आदि स्थानों में चल रहे दर्जनों क्रांतिकारी फरार है, जिनमें बहुत सी तो स्त्रियाँ है। आधा दर्जन से अधिक कैदी अपनी फाँसी की बाट जोह रहे है। इस सबके विषय में आप क्या कहते है ? लाहौर षडयन्त्र के हम तीन राजबंदी जिन्हें फाँसी का हुक्म हुआ है और जिन्होंने संयोगवश बहुत बडी ख्याति प्राप्त कर ली है, क्रांतिकारी दल के सब कुछ नहीं है। दल के सामने केवल इन्ही के भाग्य का प्रश्न नहीं है। वास्तव में इनकी सजाओं के बदल देने से देश का उतना लाभ न होगा, जितना कि इन्हें फाँसी पर चढा देने से होगा।
परंतु इन सब बातों के होते हुए भी आप इनसे अपना आंदोलन खींच लेने की सार्वजनिक अपील कर रहे है। वे ऐसा क्यों करे ? इसका कोई निश्चित कारण नहीं बतलाया। ऐसी स्थिति में आपकी इन अपीलों के निकालने का अर्थ तो यही है कि आप क्रांतिकारियों के आंदोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहे हो। इन अपीलों के द्वारा आप क्रांतिकारी दल में विश्वासघात और फूट की शिक्षा दे रहे हो। अगर ऐसी बात नहीं होती तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ प्रमुख क्रान्तिकारियों के पास जाकर इस विषय की सम्पूर्ण बातचीत कर लेते। आपको उन्हें आंदोलन खींच लेने का परामर्श देने से पहले अपने तर्को से समझाने का प्रयास करना चाहिए था। मैं नहीं मानता कि आप भी प्रचलित पुरानी धारणा में रखते है कि क्रांतिकारी तर्कहीन होते है और उन्हें केवल विनाशकारी कार्यो में ही आनन्द आता है। मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि यर्थात में बात इसके बिल्कुल विपरित है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले अपने चारो तरफ की परिस्थितियों का सूक्ष्म विचार कर लेते है। उन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास हर समय बना रहता है। वे अपने क्रांति के कार्य में दूसरे अंश की अपेक्षा रचनात्मक अंश की उपयोगिता को मुख्य स्थान देते है । यद्यपि उपस्थित परिस्थितियों में उन्हें केवल विनाशात्मक अंश की ओर ध्यान देना पडा है।
सरकार क्रांतिकारियों के प्रति पैदा हो गयी सार्वजनिक सहानुभूति तथा सहायता को नष्ट करके किसी भी तरह से उन्हें कुचल डालना चाहती है। अकेले में वे सहज ही कुचल दिए जा सकते है। ऐसी हालत में उनके दल में बुद्धि - भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावुक अपील निकाल कर उनमें विश्वासघात और फूट पैदा करना बहुत ही अनुचित और क्रान्ति विरोधी कार्य होगा इसके द्वारा सरकार को उन्हें कुचलने में प्रत्यक्ष सहायता मिलेगी। इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते है कि या तो आप कुछ क्रांतिकारी नेताओं से जो कि जेलों में है, इस विषय में बातचीत कर निर्णय कर लीजिये या फिर अपनी अपील बंद कर दीजिये। कृपा करके उपरोक्त दो मार्गो में से किसी एक का अनुसरण कीजिये। अगर आप उनकी सहायता नहीं कर सकते तो कृपा करके उन पर दया कीजिये और उन्हें अकेला छोड दीजिये वे अपनी रक्षा आप कर लेगे। वे अच्छी तरह जानते है कि भविष्य के राजनीतिक युद्ध में उनका नायकत्व निश्चित है । वे अपनी रक्षा आप कर लेगे । वे अच्छी तरह जानते है कि भविष्य के राजनैतिक युद्ध में उनका नायकत्व निश्चित है । जन समुदाय उनकी ओर बराबर बढ़ता जा रहा है और वह दिन दूर नहीं जब उनके नेतृत्व और उनके झंडे के नीचे जनसमुदाय समाजसत्ता , प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखाई पडेगा । अथवा यदि आप सचमुच उनकी सहायता करना चाहते है तो उनका दृष्टिकोण समझने के लिए उनसे बात-चीत कीजिये और सम्पूर्ण समस्या पर विस्तार के साथ विचार कर लीजिये । 
आशा है आप उपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेंगे और अपनी राय सर्व - साधारण के सामने प्रकट कर देगे । 
आपका 
अनेकों में से एक


5 टिप्‍पणियां:

  1. "क्रांतिकारी तर्कहीन होते है और उन्हें केवल विनाशकारी कार्यो में ही आनन्द आता है । मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि यथार्थ में बात इसके बिल्कुल विपरीत है, वे सदैव कोई भी काम करने से पहले अपने चारों तरफ की परिस्थितियों का गहन-सूक्ष्म विचार कर लेते है । उन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास हर समय बना रहता है ।"
    @ क्रांतिकारी सुखदेव जी ने अपनी बाती बहुत ही संयत ढंग से कही........ इसीसे से हमारे शहीदों का चरित्र और व्यक्तित्व पता चलता है.

    विश्वजीत जी, आपने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है...
    हमें हमारे महान नायकों के छिपे विचारों से अवगत कराने के लिये ..... साधुवाद.

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  2. विश्वजीत जी साधुवाद...
    आज हमें अपने मूल्यों पर पुनर्विचार कर लेना चाहिए...आँख मूँद कर किसी का अनुसरण करना भी एक प्रकार की गुलामी ही है| यद्दपि मैं गांधी जी को एक महान व्यक्ति मानता हूँ, किन्तु इस बात से भी इनकार नहीं करता की उनकी कई नीतियों से देश को बड़ा नुकसान ही हुआ है|
    शायद गांधी जी को इसका आभास भी हो गया था, तभी तो १९४८ में वे देश भर से माफ़ी मांगते फिर रहे थे...उन्हें इस बात का पछतावा था की समय रहते उन्होंने क्यों भारत को सशस्त्र व मज़बूत नहीं बनाया|

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  3. विश्वजीत भाई
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति..गांधीवाद सही या गलत ये एक तर्क का विषय हो सकता हो मगर ये सत्य है की गांधीवाद की छद्म औलादों ने अमर बलिदानी क्रांतिकारियों का जीवन चित्रण आने वाले पीढ़ियों के सामने या तो नगण्य रखा या रखा ही नहीं...मैकाले की धरम संताने गाँधी के नाम पर देश बेचने लगी और नाथूराम सुखदेव भगत सिंह नेपथ्य में दल दिए गए..
    बहुत बहुत आभार आप की प्रस्तुति के लिए..अगली कड़ी का इंतजार रहेगा
    संग्रहनीय आलेख

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  4. " क्रान्तिकारी सुखदेव का गांधी जी के नाम खुला पत्र " का शेष अंश -
    वे अपनी रक्षा आप कर लेगे । वे अच्छी तरह जानते है कि भविष्य के राजनैतिक युद्ध में उनका नायकत्व निश्चित है । जन समुदाय उनकी ओर बराबर बढ़ता जा रहा है और वह दिन दूर नहीं जब उनके नेतृत्व और उनके झंडे के नीचे जनसमुदाय समाजसत्ता , प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखाई पडेगा । अथवा यदि आप सचमुच उनकी सहायता करना चाहते है तो उनका दृष्टिकोण समझने के लिए उनसे बात-चीत कीजिये और सम्पूर्ण समस्या पर विस्तार के साथ विचार कर लीजिये ।
    आशा है आप उपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेंगे और अपनी राय सर्व - साधारण के सामने प्रकट कर देगे ।
    आपका
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