रविवार, 5 जून 2011

सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण ( न्याय प्राप्ति एवं क्षतिपूर्ति ) विधेयक 2011 - सोनिया गांधी के नेतृत्व में हिन्दुओं का दमन करने का भयानक षडयन्त्र


सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण ( न्याय एवं क्षतिपूर्ति ) विधेयक 2011 का एक मसौदा तैयार किया है जो ऊपर से देखने पर सांप्रदायिक हिंसा को रोकने वाला और दोषियों को दंडित किये जाने के प्रयास में नजर आता है लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य इसके विपरीत है। यह एक ऐसा विषाक्त विधेयक है कि यदि यह कभी पारित हो जाता है तो यह भारत के संघीय ढांचे को नष्ट कर देगा और भारत में पंथनिरपेक्षता ( धर्मनिरपेक्षता ) ही छिन्न - भिन्न हो जायेगी।
गांधीजी के पथ पर चलने वाली केन्द्र की संप्रग सरकार द्वारा मुस्लिम और ईसाई वोट बैंक को अपने पक्ष में बनाए रखने के उद्देश्य से सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट जैसे सांप्रदायिक तुष्टिकरण के कार्यो को करने के बाद अब एक ओर ऐसा सांप्रदायिक कटुता बढाने वाला और हिन्दुओं का दमन करने वाला कानून बनाने का प्रयास शुरू हो गया है जो हर हाल में बहुसंख्यक समाज ( हिन्दुओ ) को सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी ठहराएंगा। इस विधेयक को बनाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद अर्थात एनएसी को दी गई थी। एनएसी के सदस्य फरह नकवी और हर्ष मंदर के नेतृत्व में एक नया मसौदा देश के सामने रखा गया है। इस मसौदे को तैयार करने में तीस्ता जावेद सीतलवाड, गोपाल सुब्रह्मण्यम, माजा दारूवाला, नाजमी बाजीरी, पीआईजोसे, उषा रानाथन, वृंदाग्रोवर, असगर अली इंजिनियर, एच एस फुल्का, जॉन दयाल, जस्टिक होस्बेट सुरेश, मौलाना निअज फारूखी, शबनम हाशमी, सिस्टर मारी स्कारिया व सैय्यद शहाबुद्दीन जैसे व्यक्तियों की मुख्य भूमिका रही है जिनके धर्मनिरपेक्ष चरित्र कभी भी निर्विवाद नहीं रहे।
इस विधेयक में यह माना गया है कि सभी सांप्रदायिक दंगे हिन्दुओं की तरफ से शुरू किये जाते है तथा उनमें अल्पसंख्यक शिकार बनते है। विधेयक में हिन्दू दंगाईयों से अल्पसंख्यक समूहों को बचाने की बात कही गई है, अर्थात किसी भी सांप्रदायिक हिंसा में अल्पसंख्यकों को हमेशा पीडित तथा बहुसंख्यकों को हिंसा फैलाने वाला माना जायेगा। यदि किसी सांप्रदायिक झगडे में कोई अल्पसंख्यक मारा जाता है तो इस कानून के अंतर्गत इसकी जांच होगी और दोषी बहुसंख्यक समाज के व्यक्ति को कठोर दंड दिया जायेगा, लेकिन वही कोई बहुसंख्यक मारा जाता है तो उसकी साधारण जांच होगी। इस विधेयक में केवल अल्पसंख्यक समूहों की रक्षा की बात की गई है, सांप्रदायिक हिंसा के मामले में यह विधेयक बहुसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति मौन है। इस विधेयक का मसौदा बनाने वाली एनएसी की टीम यह मानती है कि दंगों और सांप्रदायिक हिंसा में सुरक्षा की आवश्यकता केवल अल्पसंख्यकों को है। इस कानून के तहत केवल बहुसंख्यकों ( हिन्दुओं ) के विरूद्ध ही मुकदमा चलाया जा सकता है, किसी भी अल्पसंख्यक ( मुसलमान, ईसाई आदि ) को इस कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती भले ही उन्होंने बहुसंख्यक समूहों के विरूद्ध कितनी भी हिंसा की हो।
इस विधेयक के अनुसार सांप्रदायिक दंगे के दौरान यौन संबंधी अपराधों को भी तभी दंडनीय मानने की बात कही गई है यदि वह अल्पसंख्यक समूहों की महिलाओं के साथ हो, अर्थात यदि किसी बहुसंख्यक ( हिन्दू ) महिला के साथ दंगे के दौरान कोई अल्पसंख्यक बलात्कार करता है तो वह दंडनीय नहीं होगा। इस विधेयक के अनुसार अल्पसंख्यक समूह के विरूद्ध कही पर भी यहाँ तक की फेसबुक, ट्विटर जैसी शोशल साईटे और ब्लॉग आदि पर भी घृणा अभियान चलाना गंभीर दंडनीय अपराध है, जबकि बहुसंख्यकों के मामले में ऐसा नहीं है।
इस विधेयक के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय का कोई भी व्यक्ति किसी भी बहुसंख्यक पर किसी भी प्रकार का आरोप लगा सकता है लेकिन बहुसंख्यक को यह अधिकार नहीं है। कोई अल्पसंख्यक यदि पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने जाये और कहे कि बहुसंख्यक समुदाय के ...... व्यक्ति के कारण उसे मानसिक या मनोवैज्ञानिक आघात लगा है तो पुलिस को इस नए कानून के तहत रिपोर्ट दर्ज करनी ही होगी। यही नहीं इस विधेयक में स्पष्ट लिखा गया है कि जब तक विशिष्ठ विवरण न हो, इस कानून के तहत तमाम अपराध संज्ञेय व गैर जमानती होगे। इस विधेयक में संविधान के इस नियम को उल्टा कर दिया गया है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, आरोपी निर्दोष है। यही नहीं प्रस्तावित मसौदे की धारा 40 के तहत शिकायतकर्ता का नाम भी गोपनीय रखा जायेगा। इसका अर्थ हुआ कि जिस व्यक्ति पर सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने का आरोप होगा वह यह भी नहीं जान पाएगा कि उसके विरूद्ध शिकायत किसने और किस आधार पर की है।
अगर किसी राज्य में सांप्रदायिक दंगा भडकता है या राजनीतिक दुश्मनी वश भडकाया जाता है और अल्पसंख्यकों को कोई हानि होती है तो केन्द्र सरकार दंगे की तीव्रता का बहाना कर राज्य सरकार के मामले में हस्तक्षेप कर सकती है और चाहे तो बर्खास्त भी कर सकती है। दंगों के दौरान होने वाले किसी भी प्रकार के जान और माल के नुकसान पर मुवावजे के अधिकारी भी केवल अल्पसंख्यक ही होगे।
भारत में पहली बार संवैधानिक और न्यायिक प्राधिकरण का गठन सांप्रदायिक कोटे के आधार पर करने का प्रस्ताव है। राष्ट्रीय व राज्यीय स्तर पर गठित होने वाले सात सदस्यीय प्राधिकरण में अध्यक्ष , उपाध्यक्ष सहित चार सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से होगे। इसके विपरीत इस कानून के तहत जो लोग अपराध के दायरे में आयेगे वे बहुसंख्यक ( हिन्दू ) समुदाय से होगे। इससे इस प्राधिकरण के हिन्दुओँ के प्रति न्याय की कसौटी पर खरा उतरने की आशंका हमेशा बनी रहेगी। वोटो की लालची सरकार यह कब समझेगी कि दंगों में अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक नहीं अपितु एक आम आदमी मारा जाता है। हिंसा अल्पसंख्यक समुहों के प्रति हो या बहुसंख्यक समूहों के प्रति दोनों ही दंडनीय अपराध की श्रेणी में आने चाहिए।
भाईयों धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पहले ही हिन्दू साध्वी प्रज्ञा पर अमानवीय अत्याचार और स्वामी रामदेव का अपमान किया जा रहा है, अगर हम अभी भी न जागे तो अगली बारी हम सब हिन्दुओं की है ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

3 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानवर्धक लेख, आप इस लेख को हमें मेल भेंजे प्रिंट करके वितरित करना है ताकि लोग कांग्रेस का असल चेहरा देंखे. satybolnapaphai@gmail.com

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  2. श्री गंगाधर जी आप इस लेख को मेल द्वारा या प्रिंट आदि करके राष्ट्रहित में वितरीत कर सकते है ।
    वन्दे मातरम्

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  3. इस विधेयक के अनुसार सांप्रदायिक दंगे के दौरान यौन संबंधी अपराधों को भी तभी दंडनीय मानने की बात कही गई है यदि वह अल्पसंख्यक समूहों की महिलाओं के साथ हो, अर्थात यदि किसी बहुसंख्यक ( हिन्दू ) महिला के साथ दंगे के दौरान कोई अल्पसंख्यक बलात्कार करता है तो वह दंडनीय नहीं होगा। इस विधेयक के अनुसार अल्पसंख्यक समूह के विरूद्ध कही पर भी यहाँ तक की फेसबुक, ट्विटर जैसी शोशल साईटे और ब्लॉग आदि पर भी घृणा अभियान चलाना गंभीर दंडनीय अपराध है, जबकि बहुसंख्यकों के मामले में ऐसा नहीं है। यह तो सरासर लोक तंत्र का मजाक उड़ाना है. यानि की कम लोंगो के लिए अधिक लोंगो को सजा.

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