सोमवार, 11 अप्रैल 2011

इरविन - गांधी समझौता और भगतसिँह की फाँसी



मार्च 1931 मेँ गांधीजी ने ब्रिटिस सरकार के प्रतिनिधि लार्ड एडवर्ड इरविन के साथ समझौता किया । इस समझौते के अन्तर्गत ब्रिटिस सरकार द्वारा कांग्रेसी आन्दोलन के सभी बंदी छोड दिये गये , परन्तु क्रान्तिकारी आन्दोलन गदर पार्टी के बंदी , लोदियोँ मार्शल ला के बंदी , अकाली बंदी , देवगढ , काकोरी , महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केश आदि के बंदियोँ को छोडने से इन्कार कर दिया । गांधीजी ने भी इस समझौते के अनुपालन मेँ अपना आन्दोलन वापस ले लिया और अन्य आन्दोलन कर्ता क्रान्तिकारियोँ से भी अपना आन्दोलन वापस लेने की अपील की । गांधीजी की अपील के प्रत्युत्तर मेँ लाहौर षडयन्त्र केस के क्रान्तिकारी सुखदेव ने गांधीजी के नाम खुला पत्र लिखकर गांधीजी पर क्रान्तिकारियोँ को कुचलने के लिए ब्रिटिस सरकार का साथ देने का आरोप लगाया था और पत्र मेँ दो विचार धाराओँ के बीच मतभेदोँ पर प्रकाश डाला था । उन्होँने इस समझोते पर सवाल खडे किये थे तथा गांधीजी से अपनी शंका का समाधान करने का आग्रह किया था । लेकिन गांधीजी ने सुखदेव के जीते - जी उनके पत्र का कोई उत्तर नहीँ दिया था । सुखदेव के पत्र का संक्षिप्त सार यह हैँ -
अत्यन्त सम्मानीय महात्मा जी आपने क्रान्तिकारियोँ से अपना आन्दोलन रोक देने की अपील निकाली हैँ । कांग्रेस लाहौर के प्रस्तावानुसार स्वतन्त्रता का युद्ध तब तक जारी रखने के लिए बाध्य हैँ जब तक पूर्ण स्वाधीनता ना प्राप्त हो जाये । बीच की संधिया और समझौते विराम मात्र हैँ । यद्यपि लाहौर के पूर्ण स्वतन्त्रता वाले प्रस्ताव के होते हुए भी आपने अपना आन्दोलन स्थगित पर दिया हैँ , जिसके फलस्वरूप आपके आन्दोलन के बन्दी छुट गए हैँ । परन्तु क्रान्तिकारी बंदियोँ के बारे मेँ आप क्या कहते हो । सन 1915 के गदर पार्टी वाले राजबंदी अब भी जेलोँ मेँ सड रहे हैँ , यद्यपि उनकी सजाऐ पूरी हो चुकी हैँ । लोदियोँ मार्शल ला के बंदी जीवित ही कब्रो मेँ गडे हुए है , इसी प्रकार दर्जनोँ बब्बर अकाली कैदी जेल मेँ यातना पा रहे है । देवगढ , काकोरी , महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केस , दिल्ली , चटगॉव , बम्बई , कलकत्ता आदि स्थानोँ मेँ चल रहे क्रान्तिकारी फरार , जिनमेँ बहुत सी तो स्त्रियाँ है । आधा दर्जन से अधिक कैदी तो अपनी फाँसियोँ की बाट जोह रहे हैँ । इस विषय मेँ आप क्या कहते हैँ । लाहौर षडयन्त्र के हम तीन राजबंदी जिन्हेँ फाँसी का हुक्म हुआ है और जिन्होँने संयोगवश बहुत बडी ख्याति प्राप्त कर ली है , क्रान्तिकारी दल के सब कुछ नहीँ हैँ । देश के सामने केवल इन्ही के भाग्य का प्रश्न नहीँ हैँ । वास्तव मेँ इनकी सजाओँ के बदलने से देश का उतना कल्याण न होगा जितना की इन्हेँ फाँसी पर चढा देने से होगा ।
परन्तु इन सब बातोँ के होते हुए भी आप इनसे अपना आन्दोलन खीँच लेने की सार्वजनिक अपील कर रहे है । अपना आन्दोलन क्योँ रोक ले , इसका कोई निश्चित कारण नहीँ बतलाया । ऐसी स्थिति मेँ आपकी इन अपीलोँ के निकालने का मतलब तो यहीँ हैँ कि आप क्रान्तिकारियोँ के आन्दोलन को कुचलने मेँ नौकरशाही का साथ दे रहेँ होँ । इन अपीलोँ द्वारा स्वयं क्रान्तिकारी दल मेँ विश्वासघात और फूट की शिक्षा दे रहे होँ । गवर्नमेँट क्रान्तिकारियोँ के प्रति पैदा हो गयी सहानुभूति तथा सहायता को नष्ट करके किसी तरह से उन्हेँ कुचल डालना चाहती है । अकेले मेँ वे सहज ही कुचले जा सकते है , ऐसी हालत मेँ किसी प्रकार की भावुक अपील निकाल कर उनमेँ विश्वासघात और फूट पैदा करना बहुत ही अनुचित और क्रान्ति विरोधी कार्य होगा । इसके द्वारा गवर्नर को , उन्हेँ कुचल डालने मेँ प्रत्यक्ष सहायता मिलती हैँ । इसलिए आपसे हमारी प्रार्थना है कि या तो आप क्रान्तिकारी नेताओँ से जो कि जेलोँ मेँ हैँ , इस विषय पर सम्पूर्ण बातचीत कर निर्णय लीजिये या फिर अपनी अपील बन्द कर दीजिये । कृपा करके उपरोक्त दो मार्गो मेँ से किसी एक का अनुसरण कीजिये । अगर आप उनकी सहायता नहीँ कर सकते तो कृपा करके उन पर रहम कीजिये और उन्हेँ अकेला छोड दीजिये । वे अपनी रक्षा आप कर लेगे ।
आशा है आप अपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेँगे और अपनी राय सर्व साधारण के सामने प्रकट कर देगे ।
आपका
अनेकोँ मेँ से एक
भगतसिँह व उनके साथियोँ को मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश आक्रोषित था व गांधीजी की ओर इस आशा से देख रहा था कि वह अनशन कर इन देशभक्तोँ को मृत्यु से बचाएगे । राष्ट्रवादियोँ ने गांधीजी से राजगुरू , सुखदेव और भगतसिँह के पक्ष मेँ हस्तक्षेप कर ब्रिटिस सरकार से उनकी फाँसी माफ कराने की प्रार्थना की । परन्तु जनता की प्रार्थना को गांधीजी ने इस तर्क के साथ ठुकरा दिया कि मैँ हिँसा का पक्ष नहीँ ले सकता । जब प्रथम विश्वयुद्ध ( 1914 - 1918 ) के दौरान भारतीय सैनिकोँ ने हजारोँ जर्मनोँ को मौत के घाट उतारा तो क्या गांधीजी ने हिँसा का पक्ष नहीँ लाया था ? परन्तु शायद वह हिँसा इसलिए नहीँ थी , क्योँकि वे सैनिक अंग्रेजोँ की सेना मेँ जर्मनोँ को मारने के लिए उन्होँने भर्ती कराये थे । विश्वयुद्ध के दौरान गांधीजी ने वायसराय चेम्स फोर्ड को एक पत्र भी लिखा था । पत्र मेँ उन्होँने लिखा था - " मैँ इस निर्णायक क्षण पर भारत द्वारा उसके शारीरिक रूप से स्वस्थ पुत्रोँ को अंग्रेजी साम्राज्य पर बलिदान होने के रूप मेँ प्रस्तुत किये जाने के लिए कहूँगा । "
प्रथम विश्वयुद्ध मेँ उन्हेँ ब्रिटिस साम्राज्य के प्रति उनकी सेवाओँ के लिए 'केसर-ए-हिन्द' स्वर्ण पदक से अलंकृत किया गया था ।
अगर गांधी जी हस्तक्षेप करते तो भगतसिंह और उसके साथियों को बचाया जा सकता था , क्योंकि ब्रिटिस सरकार ने ऐसे संकेत दिये थे । गांधी जी जानते थे कि वायसराय के पास फाँसी की सजा माफ करने के पूरे अधिकार हैं । लेकिन उनकी तरफ से इस बारे में कोई गंभीर प्रयास नहीं हुए ।
लार्ड इरविन ने अपनी डायरी में लिखा था कि ' दिल्ली में जो समझौता हुआ उससे अलग और अंत में मिस्टर गांधी ने भगत सिंह का उल्लेख किया था , पर उनकी फाँसी की सजा रदद करने के लिए कोई पैरवी नहीं की । ' इस सन्दर्भ में गांधी जी के करीबी और उनके अनन्य भक्त डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या ने लिखा हैं , ' समझौते की बातचीत के दौरान भगत सिंह और उनके साथी राजगुरू व सुखदेव की फाँसी की सजा को अन्य सजा के रूप में परिवर्तित कर देने के बारे में गांधी जी और वाइसराय के बीच बार - बार लम्बी बातें हुई । इस संदर्भ में वायसराय ने इतना ही आश्वासन दिया कि मार्च , 1931 की अंतिम तिथियों में कराची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन तक इन्हें फाँसी नहीं दी जाएगी । ' गांधी जी ने वायसराय से कहा , ' अगर इन नौजवानों को फाँसी पर लटकाना ही हैं तो कांग्रेस अधिवेशन के बाद ऐसा करने के बजाय उससे पहले ठीक होगा । इससे लोगों के दिलों में झूठी आशाएं नहीं बंधेगी । '
वायसराय भी मान गया । वह भी इस मुसीबत से जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहता था । अंततः कराची - कांग्रेस अधिवेशन से पूर्व राजगुरू , सुखदेव और भगतसिंह को नियम भंग कर 24 मार्च 1931 को प्रातःकाल दी जाने वाली फाँसी 23 मार्च को शाम में ही दे दी गई । अंग्रेजों ने निमर्मता की सभी हदे पार करते हुए उनके शवों के टुकडे - टुकडे करें और उन्हें चुपचाप लाहौर से पचास मील दूर ले जाकर फिरोजपुर के समीप सतलुज नदी के किनारे जला डाला । सारा देश इस अन्याय के विरूद्ध उठ खडा हुआ , लेकिन गांधी जी शान्त रहें ।
इसके बाद कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गांधी जी कराची पहुंचे तो नौजवानों ने उन्हें काले कपडे से बने फूल और वह राख भेट की जो इन तीन वीर शहीदों की लाशों को जलाने के बाद बची रह गयी थी । नौजवान नारे लगा रहे थे - गांधीवाद का नाश हो , गांधी वापस जाओ ।
भगत सिंह की फाँसी पर आये कुछ प्रसिद्ध वक्तव्य -
' मैने भगतसिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा । मैं उसकी विशेषता को शब्दों में बयां नही कर सकता । उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय हैं । लेकिन इसने अपने असाधारण साहस का दुरूपयोग किया । मैं भगत सिंह और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूँ । साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूँ कि वे इसके मार्ग पर न चले । ( मोहनदास कर्मचन्द गांधी )
जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फाँसी पर लटकाने की सलाह दी , वह देश का गद्दार और शैतान था । ( पंजाब केसरी )
यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक हैं कि भगतसिंह और उसके साथियों को एक दिन पूर्व ही फाँसी दे दी गई , 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में यह दुखद समाचार मिला । भगतसिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतिक बन गया हैं । ( सुभाष चन्द्र बोस )
अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को साडर्स हत्याकाण्ड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था । फिर भी उसे फाँसी दे दे गई । ( सरदार वल्लभ भाई पटेल )
भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फाँसी दी जाती । हम इस घटना की कडी निन्दा करते हैं । ( डी. वी. रंगाचरियार )
गांधी जी की जरा भी इच्छा नहीं थी कि कराची के कांग्रेस अधिवेशन में शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदान के प्रति कोई सम्मान जताया जाये । वह नहीं चाहते थे कि कांग्रेस इन शहीदों के समर्थन में कोई प्रस्ताव पास करें । लेकिन दबाव इतना अधिक था कि कांग्रेस को इन वीर शहीदों के पक्ष में प्रस्ताव पास करना पडा । जहां तक समझौते की बात थी इरविन - गांधी समझौता एक मजाक बनकर रह गया था । जिन शर्तो को लेकर गांधी जी ने समझौता किया था उनमें से एक भी शर्त लार्ड इरविन ने पूरी तरह नहीं मानी थी ।
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

15 टिप्‍पणियां:

  1. ab mujhe aur uttejit nab kero, nahi to 1 aur Nathuram Gaudse ban jaunga

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  2. गांधी एक बहुत बड़ा तानाशाह था। वह बंदूकों से नहीं लड़ता था उसके हथियार मक्कारी, ढोंग, और हर उस व्यक्ति को कुचल देने का षड्यन्त्र करना था जो कभी उससे ज्यादा प्रसिद्धि पाता दिखता था। ये हमेशा अपने नाम के लिए मरता रहा। इसकी सोच देश के लिए नहीं बल्कि खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की थी।

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  3. श्रीभारत श्रीवास्तवजी आपने तो आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के दिल की बात कह दी । नेताजी सुभाष ने मोहनदासजी गांधी की तुलना हिटलर , मुसोलिनी और लेनिन जैसे तानाशाह नेताओं से की थी । ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित नेताजी की पुस्तक ' द इंडियन स्ट्रगल 1920 - 1942 ' में उन्होंने लिखा कि गांधी ने जनता की मनोभावना का ठीक वैसे ही दोहन किया , जैसे रूस में लेलिन , जर्मनी में हिटलर और इटली में मुसोलिनी ने किया था ।

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  4. गाँधी ने देश को आजाद नही कराया बल्की सच ये है एक टुकड़ा काट कर पाकिस्तान बना दिया भला हो गोड़से जी का जिन्होने गांधी का संहार कर के और टुकड़े होने से बचा लिया

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  5. गाँधी ने देश को आजाद नही कराया बल्की सच ये है एक टुकड़ा काट कर पाकिस्तान बना दिया भला हो गोड़से जी का जिन्होने गांधी का संहार कर के और टुकड़े होने से बचा लिया

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  6. afsos ki hamare desh ke log gandhi ko samajh nahi payain gandhi mahan hai enke vichar mahan hain agar a gandhi Hitlor hotain to ahinsa ka sath nahi dete koi bhi admi sabko khush nahi rakh sakata hain

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  7. sach hain gandhi ne desh ke do tukaro main bant dia lakin gandhi nahi hote to desh kai bhagon main bat jata socho jara ek aisa desh jahan samaj main sabhi insano ko saman adhikar nahi dia jata tha ucha jati nich jati ke sath amanviy behave kartha tha gandhi ne ise door karne ke liye pora jivan laga dia lakin aaj bhi nich jatiyo ke log enko bora admi kahte gandhi ne apna pora jivan insano ki bhalai ke kliye laga dia chhai o muslim ho ya hindu

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  8. ghandhi ek makkar neta tha. jo apne aap ko sabse uncha dikahana chahta tha.main aagar us samay hota to jo ka godse nain 1947 ko kiya woh main 1918 ko kar deta.jab wp dohngi bharat aaya tha.

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  9. ghandhi ek makkar neta tha. jo apne aap ko sabse uncha dikahana chahta tha.main aagar us samay hota to jo ka godse nain 1947 ko kiya woh main 1918 ko kar deta.jab wp dohngi bharat aaya tha.

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  10. Vishjeet singh ji apne bahut sahi likha hai, main iski sarahna karta hu.Ye sach hai aaj jo hamara Bharat hai wo Bhagat singh ji ke sapno ka Bharat nhi hai aur ye bhi sach hai ki Bhagat singh ji ke atulya balidan ke baad bhi mahatva gandhiji ko hi diya jata hai. Kyonki aaj ki generation wo hi bolti aur manti hai jo use dikhaya jata hai. Gandhiji rashtriyapita ghoshit hai unki tasveer kai saalo se Bhartiya noto par lagi hai aur Bhagat singh ji wale sikkon ki pehal 2007 mein hui thi jo aaj bhi astitva mein nhi aaye. Janta kaise manegi ki asal hero Shaheed Bhagat singh ji hai Gandhiji nhi? kaise mane log ki ye Sukhdev ji wale patar ki baat sahi hai?

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  11. gandi sala ne desh ko bech diya, desh ki sabse badhi bimari tha gandi, jo aaj bhi kangresh ke roop me panap raha hi.
    jisne desh Bhakto ke khoon ka mulya nahi samja, wah to sabse badha hinsak tha, jishne direct nahi, indirect hinsa ki,
    gandhi nahi gaddar tha.

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    1. AKHIR GANDHI THA TO INSAAN:::::::::::
      -------------------------------------
      me ye nhi kahata gandhi mahan tha ya chor. jab tk use pura nhi jaan jata,
      but mera self opinion yahi he k gandhi tha to insan, asahyog andolan or chora chori k baad se us insan ka ego heart hua, or usne fir paristhiti ki nhi apne self ego ki suni or tab se gandhi ka styanash suru ho gaya or desh ka prinidhi hone k nate desh ka b styanash suru,
      nhi to uske pahle usne achhe hi kaam kiye, bt un achhaiyo se wo jis charam tk pahucha, us saflta ko wo pacha nhi paya, aur aatm abhimani ban khud ka or desh ka patan kr diya..........

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  12. ये एक कटु सत्य है जिससे भारत की भोली भाली जनता से छिपा के रखा गया था जो अब कुछ सार्थक प्रयासो से सबके सामने आ रहा है

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