रविवार, 6 मार्च 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - दो



उस समय गांधीवादी यही समझते थे कि गांधीजी ने पट्टाभी सीतारमैय्या को अपना पूर्ण समर्थन दिया है इसलिए वह आसानी से चुनाव जीत जाएंगे । लेकिन परिणाम उनकी आशा के ठीक विपरीत आया । सुभाष चन्द्र बोस को चुनाव मेँ 1580 मत मिले जबकि पट्टाभी सीतारमैय्या को 1377 मत मिले । गांधीजी के प्रबल विरोध के बावजूद सुभाष 203 मतोँ से चुनाव जीतकर दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये । गांधीजी को दुःख हुआ, उन्होँने कहा कि ' सुभाष की जीत गांधी की हार हैँ । ' गांधी व उनके साथियोँ ने सुभाष को उनके कार्यो मेँ सहयोग करना तो दूर उल्टा उन्हेँ मानसिक रूप से प्रताडित करना शुरू कर दिया । सुभाष ने समझोते की बहुत कौशिश की, लेकिन गांधी व गांधी के सहयोगियोँ ने उनकी एक न मानी । आखिर मेँ परेशान होकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया । और 3 मई 1939 मेँ फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी बना ली । सितम्बर 1939 मेँ यूरोप मेँ महायुद्ध छिड गया और फॉरवर्ड ब्लॉक ने नेताजी सुभाष के नेतृत्व मेँ अंग्रेजोँ के विरूद्ध देश भर मेँ प्रदर्शनोँ का आयोजन किया । 1940 मेँ सुमाष को उनके घर मेँ ही नजरबंद कर दिया गया ।
16 जनवरी 1941 को सुभाष ब्रिटिस सरकार के पहरे को तोडकर भेष बदलकर घर से भाग निकले और अखण्ड भारत को अंग्रेजोँ से मुक्त कराने के प्रयास मेँ अफगानिस्तान, रूस होते हुये जर्मनी पहुँच गये । उन्होँने जर्मनी मेँ भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिन्द रेडियोँ की स्थापना की । इसी दौरान सुभाष चन्द्र बोस नेताजी के उपनाम से जाने जाने लगे । 29 मई 1942 को नेताजी एडॉल्फ हिटलर से मिले । हिटलर ने उन्हेँ भारत का उच्च प्रतिनिधि स्वीकार किया और बिना शर्त अपना समर्थन दिया । कुछ वर्ष पूर्ण हिटलर ने ' माईन काम्फ ' नाम से अपना आत्मचरित्र लिखा था जिसमेँ उन्होँने भारत और भारतीय लोगो पर कुछ आपत्तिजनक बाते लिखी थी । नेताजी ने निर्भिक स्वर मेँ हिटलर से अपना विरोध जताया तो हिटलर ने खेद प्रकट किया और अगले संस्करण मेँ भारतीय दृष्टिकोण को बदल देने का वचन दिया ।
13 मई 1943 को नेताजी सुभाष जापान पहुँच गये और वहाँ के प्रधानमन्त्री हिदेकी तोजो से 10 जून 1943 को मुलाकात की । जापान के प्रधानमन्त्री तोजो ने नेताजी सुभाष के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हेँ आजादी की लडाई मेँ सहकार्य करने का आश्वासन दिया । जून 1943 मेँ नेताजी ने टोकियो रेडियोँ से घोषणा की कि ' अंग्रेजोँ से यह आशा करना व्यर्थ हैँ कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड देगे, हमेँ स्वयं भारत के भीतर व बाहर से भी स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करना होगा ।
4 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष ने महान प्रवासी क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस से आजाद हिन्द फौज का दायित्व ग्रहण किया । 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष ने सिंगापुर मेँ स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना की । कुछ ही दिनोँ मेँ विश्व के नौ देशोँ जापान, जर्मनी, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, बर्मा, थाईलैण्ड और आयरलैण्ड ने ' आजाद हिन्द सरकार ' को मान्यता दे दी । जापान ने अंडमान तथा निकोबार द्वीप इस अस्थाई सरकार को दे दिये । नेताजी ने अंडमान का शहीद द्वीप और निकोबार का स्वाराज्य द्वीप नामाकरण करके 30 दिसम्बर 1943 को वहाँ स्वतंत्र भारत का ध्वज फैरा दिया ।
4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने नेताजी के नेतृत्व मेँ जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिस सेना पर भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय क्षेत्रोँ को अंग्रेजोँ से मुक्त करा लिया । 22 सितम्बर 1944 को नेताजी सुभाष ने रंगून के जुबली हॉल मेँ अपने भाषण मेँ राष्ट्रभक्तोँ का आह्वान करते हुये कहा था कि - ' हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज मेँ हैँ, तुम मुझे खून दोँ, मैँ तुम्हेँ आजादी दूंगा, यह स्वातंत्र्य देवी की मांग हैँ । ' किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध मेँ आगे जाकर अंग्रेजोँ का पलडा भारी पडा और दोनो सेनाओँ को पीछे हटना पडा । ऐसे समय मेँ गांधीजी ने जिनके हाथ मेँ उस समय करोडोँ भारतीयोँ की नब्ज थी और जिनसे आजाद हिन्द फौज को काफी मदद मिल सकती थी सुभाष की सहायता के लिए कुछ नहीँ किया बल्कि गांधी के प्रिय जवाहर लाल नेहरू ने 24 अप्रैल 1945 को गुवाहाटी की एक जनसभा मेँ कहा कि - ' यदि सुभाष चन्द्र बोस ने जापान की सहायता से भारत पर हमला किया तो मैँ स्वयं तलवार उठाकर सुभाष से लडकर रोकने जाऊँगा । '
द्वितीय विश्वयुद्ध मेँ जापान और जर्मनी की हार और भारत मेँ क्रान्तिकारियोँ के प्रति गांधी के नकारात्मक दृष्टिकोण को देखते हुये सुभाष ने अखण्ड भारत की आजादी के लिये रूस से सहायता मांगने का निश्चय किया । 18 अगस्त 1945 को नेताजी ने हवाई जहाज से मांचुरिया के लिए उडान भरी । इस उडान के बाद से नेताजी का कुछ भी प्रमाणित पता नहीँ हैँ ।
23 अगस्त 1945 को जापान की दोमेई समाचार संस्था ने तथाकथित विमान दुर्घटना मेँ नेताजी सुभाष की मृत्यु का समाचार प्रसारित किया । जिस पर स्वभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि नेताजी सुभाष यदि 18 अगस्त 1945 को मर चुके थे तो उन्हेँ 1999 तक राष्ट्र संघ का युद्ध अपराधी घोषित क्योँ किया गया ?
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुभाष हिंदुत्वविरोधी और इस्लामसमर्थक था.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुभाष हिंदुत्वविरोधी और इस्लामसमर्थक था.

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

मित्रोँ आप यहाँ पर आये है तो कुछ न कुछ कह कर जाए । आवश्यक नहीं कि आप हमारा समर्थन ही करे , हमारी कमियों को बताये , अपनी शिकायत दर्ज कराएँ । टिप्पणी मेँ कुछ भी हो सकता हैँ , बस गाली को छोडकर । आप अपने स्वतंत्र निश्पक्ष विचार टिप्पणी में देने के लिए सादर आमन्त्रित है ।