शनिवार, 5 मार्च 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - एक


23 जनवरी 1897 को कटक के प्रसिद्ध अधिवक्ता जानकीनाथ बोस के घर जन्मेँ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बाल्यकाल से ही निर्भय, बलवान एवं साहसी थे । इनकी माता प्रभावती एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी । अंग्रेजी प्रबंधकोँ द्वारा भारतीयोँ पर किये जा रहे अत्याचारोँ ने तथा धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द के भाषणोँ एवं लेखोँ ने उनके अंतर्मन पर गहरा प्रभाव डाला, अल्प आयु मेँ ही उन्होँने ग्राम सुधार के क्रान्तिकारी कार्यो मेँ भाग लेना शुरू कर दिया । सुभाष ने 1913 मेँ मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की । 1919 मेँ कोलकात्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की । 15 सितम्बर 1919 को सुभाष इंग्लैँड गये और कैंब्रिज विश्वविद्यालय मेँ प्रवेश ले लिया । आई. सी. एस. की परीक्षा पास कर लेने पर अंग्रेजी सरकार ने उन्हेँ लन्दन मेँ ही नौकरी दे दी । लेकिन सुभाष ने भारत की जनता पर अंग्रेजी सरकार द्वारा किये जा रहे अत्याचारोँ को देखते हुये अंग्रेजोँ की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और 16 जुलाई 1921 को भारत वापस लौटकर मातृभूमि को आजाद करवाने के कार्य मेँ जुट गये । 20 जुलाई 1921 को उन्होँने गांधीजी से मुलाकात की और अपना समर्थन दिया । सुभाष अपने भारत प्रवास के दौरान ग्यारह बार अंग्रेजोँ की कैद मेँ रहें । आजाद हिन्द फौज के पुर्नसंस्थापक एवं आजाद हिन्द सरकार के पुरोधा नेताजी सुभाष ने रंगून के जुबली हॉल मेँ अपने भाषण मेँ राष्ट्रभक्तोँ का आह्वान करते हुये कहा था कि - ' हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज मेँ हैँ, तुम मुझे खून दोँ, मैँ तुम्हेँ आजादी दूंगा । '
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सुभाष को प्रेरित करने मेँ चितरंजन दास का विशेष योगदान था । 1922 मेँ सुभाष कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चुने गये । सुभाष ने अपने कार्यकाल के दौरान कोलकात्ता महापालिका का पूरा तंत्र और कार्यपद्धति को ही बदल डाला । कोलकात्ता के रास्तोँ के नाम बदलकर, उन्हेँ भारतीय नाम दिये गये । स्वतंत्रता संग्राम मेँ प्राण न्योछावर करने वालोँ के परिवार के सदस्योँ को नौकरी दी जाने लगी । बहुत ही कम समय मेँ सुभाष देश के एक महत्वपूर्ण शक्तिशाली युवा नेता बन गये । युवा वर्ग के प्रति उनके विचार काफी दृढ थेँ, वे सदैव युवाओँ को अपने आन्दोलन से जोडते रहेँ । जवाहर लाल नेहरू के साथ मिलकर सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकोँ की इंडिपेडन्स लिग शुरू की ।
1928 मेँ कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन मेँ सुभाष ने गणवेश धारण करके उस समय के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी । गांधीजी उन दिनोँ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से सहमत नहीँ थे और इस अधिवेशन मेँ उन्होँने अंग्रेजी सरकार की अपनिवेशी स्वतंत्रता की सन्धि को स्वीकार कराने की ठान ली थी । लेकिन सुभाष को पूर्ण स्वतंत्रता से पिछे हटना स्वीकार न था । सुभाष ने इस सन्धि का विरोध करते हुये कहा कि हम भारत की पूर्ण आजादी से कम कोई भी बात स्वीकार नहीँ करेंगे । हमेँ अधूरी आजादी स्वीकार नहीँ हैँ । हमेँ पूर्ण स्वतंत्रता चाहिये और हम इसे प्राप्त करने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैँ ।
26 जनवरी 1931 के दिन कोलकात्ता मेँ सुभाष स्वतंत्रता के उपासकोँ के एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे, जिस पर पुलिस ने लाठियाँ चलायी और सुभाष को घायल कर दिया । जब सुभाष जेल मेँ थे तो गांधीजी ने चतुराई पूर्वक क्रान्तिकारियोँ मेँ आपसी फूट डालने के लिये अंग्रेजी सरकार से समझोता किया और सब कांग्रेसी कैदियोँ को रिहा किया गया । लेकिन अंग्रेजी सरकार ने भगतसिंह जैसे प्रखर राष्ट्रभक्त क्रान्तिकारियोँ को रिहा करने से इन्कार कर दिया । भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव की फांसी माफ कराने के लिये गांधीजी ने अंग्रेजी सरकार से बात तो की लेकिन उन्हेँ बचाने के लिये कोई दृढ इच्छाशक्ति प्रकट नहीँ की । सुभाष चाहते थे कि इस मुद्दे पर गांधीजी अंग्रेजी सरकार के साथ किया गया समझोता तौड देँ । लेकिन गांधीजी अंग्रेजी सरकार के साथ किया गया समझोता तौडने को तैयार न हुये । अन्त मेँ भगतसिंह और उनके साथियोँ को नियम विरूद्ध 24 मार्च 1931 को प्रातःकाल दी जाने वाली फाँसी 23 मार्च को शाम मेँ ही दे दी गई, सारा देश इस अन्याय के खिलाप उठ खडा हुआ, लेकिन गांधीजी शान्त रहेँ । भगतसिंह को न बचा पाने के कारण सुभाष तथा अन्य राष्ट्रवादी युवा गांधीजी की नीतियोँ के विरोधी हो गये ।
नेताजी सुभाष मेँ नेतृत्व के सभी गुण विद्यमान थे । प्रखर देशभक्ति, त्याग की भावना, कार्य निष्पादित करने की लगन, दार्शनिकता और दूरदर्शी सोच । अतः 1938 मेँ सुभाष को कांग्रेस के 51 वेँ अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया । अपने अध्यक्ष पद के कार्यकाल मेँ सुभाष ने योजना आयोग की स्थापना की और जवाहर लाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया । इसी दौरान यूरोप मेँ द्वितीय विश्व युद्ध के बादल छा गए । सुभाष चाहते थे कि इंग्लैँड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत की आजादी की लडाई को ओर तेज किया जाये । यह भारत की आजादी के लिए स्वर्णिम अवसर है । लेकिन गांधीजी को उनके स्वतंत्रता के हेतुक कार्यकलाप पसंद नहीँ आये और वह उनके विचारोँ से सहमत नहीँ हुये ।
1939 मेँ जब कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनने का समय आया तो सुभाष चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो अखण्ड भारत की पूर्ण आजादी के विषय पर किसी के दबाव के सामने न झुके । ऐसा कोई व्यक्ति सामने न आने पर सुभाष ने स्वयं अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहा । लेकिन गांधीजी जिस बात को अपने अनुकूल नहीँ पाते थे उसे दबा देते थे । सुभाष कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए गांधी की नीतियोँ पर नहीँ चले अतः गांधीजी व उनके साथी सुभाष को अपने रास्ते से हटाना चाहते थे । गांधीजी ने सुभाष के खिलाप पट्टाभी सीतारमैय्या को चुनाव लडाया । किन्तु उस समय गांधी से कही ज्यादा लोग सुभाष को चाहते थे । उस समय सिर्फ सुभाष ही थे जिन्होँने लोगो के दिलोँ पर राज किया था ।
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

5 टिप्‍पणियां:

  1. उस समय मोहनदास गांधीजी के समकक्ष जो एक मात्र व्यक्तित्व अस्तित्व मेँ था वह केवल राष्ट्रपितामह सुभाष चन्द्र बोस ही था बल्कि वे गांधीजी से भारी पडने लगे थे । वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गये थे । मोहनदास गांधी और राष्ट्रपितामह सुभाष दोनोँ कांग्रेसी थे पर गांधीजी सुभाष की लोकप्रियता को पचा नहीँ सके, उन्हेँ रास्ते से हटाने के लिए गांधीजी ने सारे कांग्रेसी उपाय किए ।

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  2. सच्चे और अच्छे व्यक्तित्व को हमेशा दबा दिया जाता है । क्यूंकि लोगों को उनसे अपना अस्तित्व खतरे में घिरा दीखता है । लेकिन क्या कोई दबा पता है किसी को ? नेताजी आज भी देशभक्तों के दिलों में मशाल की तरह जीवित हैं और अपनी रौशनी से हमारा जीवन भी आलोकित कर रहे हैं ।

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  3. अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

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