रविवार, 12 दिसंबर 2010

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा -वीर नाथूराम गोडसे भाग - एक




19 मई 1910 को मुम्बई - पुणे के बीच ' बारामती ' में संस्कारित राष्ट्रवादी हिन्दु परिवार मेँ जन्मेँ वीर नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसके सुनते ही लोगोँ के मन-मस्तिष्क मेँ एक ही विचार आता है कि गांधी का हत्यारा । इतिहास मेँ भी गोडसे जैसे परम राष्ट्रभक्त बलिदानी का इतिहास एक ही पंक्ति मेँ समाप्त हो जाता है । गांधी का सम्मान करने वाले गोडसे को गांधी का वध आखिर क्योँ करना पडा,इसके पीछे क्या कारण रहे, इन कारणोँ की कभी भी व्याख्या नही की जाती ।
नाथूराम गोडसे एक विचारक, समाज सुधारक, पत्रकार एवं सच्चा राष्ट्रभक्त था और गांधी का सम्मान करने वालोँ मेँ भी अग्रीम पंक्ति मेँ था । किन्तु सक्ता परिवर्तन के पश्चात गांधीवाद मेँ जो परिवर्तन देखने को मिला, उससे नाथूराम ही नहीँ करीब-करीब सम्पूर्ण राष्ट्रवादी युवा वर्ग आहत था । गांधीजी इस देश के विभाजन के पक्ष मेँ नहीँ थे । उनके लिए ऐसे देश की कल्पना भी असम्भव थी, जो किसी एक धर्म के अनुयायियोँ का बसेरा हो । उन्होँने प्रतिज्ञयापूर्ण घोषणा की थी कि भारत का विभाजन उनकी लाश पर होगा । परन्तु न तो वे विभाजन रोक सके, न नरसंहार का वह घिनौना ताण्डव, जिसने न जाने कितनोँ की अस्मत लूट ली, कितनोँ को बेघर किया और कितने सदा - सदा के लिए अपनोँ से बिछड गये । खण्डित भारत का निर्माण गांधीजी की लाश पर नहीँ, अपितु 25 लाख हिन्दू, सिक्खोँ और मुसलमानोँ की लाशोँ तथा असंख्य माताओँ और बहनोँ के शीलहरण पर हुआ ।
किसी भी महापुरुष के जीवन मेँ उसके सिद्धांतोँ और आदर्शो की मौत ही वास्तविक मौत होती है । जब लाखोँ माताओँ, बहनोँ के शीलहरण तथा रक्तपात और विश्व की सबसे बडी त्रासदी द्विराष्ट्रवाद के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ । उस समय गांधी के लिए हिन्दुस्थान की जनता मेँ जबर्दस्त आक्रोश फैल चुका था ।प्रायः प्रत्येक की जुबान पर एक ही बात थी कि गांधी मुसलमानोँ के सामने घुटने चुके है ।रही - सही कसर पाकिस्तान को 55 करोड रुपये देने के लिए गांधी के अनशन ने पूरी कर दी । उस समय सारा देश गांधी का घोर विरोध कर रहा था और परमात्मा से उनकी मृत्यु की कामना कर रहा था ।
जहाँ एक और गांधीजी पाकिस्तान को 55 करोड रुपया देने के लिए हठ कर अनशन पर बैठ गये थे, वही दूसरी और पाकिस्तानी सेना हिन्दू निर्वासितोँ को अनेक प्रकार की प्रताडना से शोषण कर रही थी, हिन्दुओँ का जगह - जगह कत्लेआम कर रही थी, माँ और बहनोँ की अस्मतेँ लूटी जा रही थी, बच्चोँ को जीवित भूमि मेँ दबाया जा रहा था । जिस समय भारतीय सेना उस जगह पहुँचती, उसे मिलती जगह - जगह अस्मत लुटा चुकी माँ - बहनेँ, टूटी पडी चुडियाँ, चप्पले और बच्चोँ के दबे होने की आवाजेँ ।ऐसे मेँ जब गांधीजी से अपनी जिद छोडने और अनशन तोडने का अनुरोध किया जाता तो गांधी का केवल एक ही जबाब होता - "चाहे मेरी जान ही क्योँ न चली जाए, लेकिन मैँ न तो अपने कदम पीछे करुँगा और न ही अनशन समाप्त करुगा ।" आखिर मेँ नाथूराम गोडसे का मन जब पाकिस्तानी अत्याचारोँ से ज्यादा ही व्यथित हो उठा तो मजबूरन उन्हेँ हथियार उठाना पडा । नाथूराम गोडसे ने इससे पहले कभी हथियार को हाथ नही लगाया था । 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने जब गांधी पर गोली चलायी तो गांधी गिर गये । उनके इर्द-गिर्द उपस्थित लोगोँ ने गांधी को बाहोँ मेँ ले लिया । कुछ लोग नाथूराम गोडसे के पास पहुँचे । गोडसे ने उन्हेँ प्रेमपूर्वक अपना हथियार सौप दिया और अपने हाथ खडे कर दिये । गोडसे ने कोई प्रतिरोध नहीँ किया । गांधी वध के पश्चात उस समय समूची भीड मेँ एक ही स्थिर मस्तिष्क वाला व्यक्ति था, नाथूराम गोडसे । गिरफ्तार होने के बाद गोडसे ने डाँक्टर से शांत मस्तिष्क होने का सर्टिफिकेट मांगा, जो उन्हेँ मिला भी ।
नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के सम्मुख अपना पक्ष रखते हुए गांधी का वध करने के 150 कारण बताये थे। उन्होँने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वह अपने बयानोँ को पढकर सुनाना चाहते है । अतः उन्होँने वो 150 बयान माइक पर पढकर सुनाए । लेकिन नेहरु सरकार ने (डर से) गोडसे के गांधी वध के कारणोँ पर रोक लगा दी जिससे वे बयान भारत की जनता के समक्ष न पहुँच पाये । गोडसे के उन क्रमबद्ध बयानोँ मेँ से कुछ बयान आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा जिससे आप जान सके कि गोडसे के बयानोँ पर नेहरु ने रोक क्योँ लगाई ? तथा गांधी वध उचित था या अनुचित ?
दक्षिण अफ्रिका मेँ गांधीजी ने भारतियोँ के हितोँ की रक्षा के लिए बहुत अच्छे काम किये थे । लेकिन जब वे भारत लोटे तो उनकी मानसिकता व्यक्तिवादी हो चुकी थी । वे सही और गलत के स्वयंभू निर्णायक बन बैठे थे । यदि देश को उनका नेतृत्व चाहिये था तो उनकी अनमनीयता को स्वीकार करना भी उनकी बाध्यता थी । ऐसा न होने पर गांधी कांग्रेस की नीतियोँ से हटकर स्वयं अकेले खडे हो जाते थे । वे हर किसी निर्णय के खुद ही निर्णायक थे । सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए गांधी की नीति पर नहीँ चलेँ । फिर भी वे इतने लोकप्रिय हुए की गांधीजी की इच्छा के विपरीत पट्टाभी सीतारमैया के विरोध मेँ प्रबल बहुमत से चुने गये । गांधी को दुःख हुआ, उन्होँने कहा की सुभाष की जीत गांधी की हार है । जिस समय तक सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस की गद्दी से नहीँ उतारा गया तब तक गांधी का क्रोध शांत नहीँ हुआ ।
मुस्लिम लीग देश की शान्ति को भंग कर रही थी और हिन्दुओँ पर अत्याचार कर रही थी । कांग्रेस इन अत्याचारोँ को रोकने के लिए कुछ भी नहीँ करना चाहती थी, क्योकि वह मुसलमानोँ को खुश रखना चाहती थी । गांधी जिस बात को अनुकूल नहीँ पाते थे उसे दबा देते थे । इसलिए मुझे यह सुनकर आश्चर्य होता है की आजादी गांधी ने प्राप्त की । मेरा विचार है की मुसलमानोँ के आगे झुकना आजादी के लिए लडाई नहीँ थी । गांधी व उसके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे ।
क्रमश .......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

53 टिप्‍पणियां:

  1. सूर्य के तेज को राहू कुछ समय के लिए तो छिपा सकते हैं परन्तु यह ग्रहण समाप्त अवश्य होता है | हम इस माहन हुतात्मा को यथोचित सम्मान अवश्य ही दिलाएंगे |

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  2. देश विभाजन के दोषियोँ मेँ गांधी - नेहरू प्रमुख थे । मोहनदास करमचंद गांधी ने तो खिलापत आन्दोलन ( जिसका भारत या भारत के मुसलमानोँ से कोई सम्बन्ध नहीँ था । ) का समर्थन करके पाकिस्तान का आधार तो मौहम्मद अली जिन्ना से भी पहले रख दिया था ।

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  3. NATHURAM GODSE KO MERA SAT SAT NAMAN


    VANDE MATARAM

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  4. nathu ram ji ko yeh kaam 20 saal pehle kar dena chihye tha

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  5. Aapne ander hi ander musalmano ko bahut kuch keh diya,,,,,,world me muslim population ko dekho. tab musalmano ke bare me kehna. blog me likhna bahut aasaan hai. musalmano apne is desh ke liye bahut kuch kiya hai..unpar arop mat lago

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  6. i am very excited to know about nathuram godse was not only good reformer ,he was real worthy son of india, i am hearty with him. and will follow his precious preaches.

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  7. Dear sir,
    Aap ko mera namaskar, Aap itihas ke pahle saksh hai jo nathu ram jaise sachhe desbhakt ke baare me jankari di. us vir sapoot ko mera sat-sat naman.

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  8. बेनामी जी मैने अन्दर ही अन्दर मुसलमानों पर आरोप नहीं लगाया है , मैं तो डॉ. अब्दुल कलाम , अश्फाक उल्ला खाँ और इब्राहीम गारदी जैसे सच्चे राष्ट्रभक्त मुसलमानों का हृदय से आदर करता हूँ , लेकिन जो अरब साम्राज्य वादी मानसिकता के कट्टर जेहादी तत्व है उनका विरोध करता हूँ । आखिर मुसलमान भी तो शिव ( संगे अवशद ) और शक्ति ( अल्लाह ) के उपासक है । क्षेत्र , भाषा और समय के प्रभाव से मुसलमानों में धर्म के प्रति रूढि आ गई है , वरना वह भी विशुद्ध रूप से सनातन धर्म का एक अभिन्न अंग है ।

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  9. Ekdam Bakwas hai ye Nathuram godse ek Non-secculan aadmi tha wo keval Hindu Dharam ko manta tha wo insaan nhi tha.

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  10. mai Nathuram Godase ji ka Aadar karta hu ye Gandhi hattya bahut pahale hoti to hamara HINDURATRA ka sapna pura hota tha.

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  11. maine jab swatyantryveer V.D.Savrkar ji ke HINDUPADPADSHI ye book padha tabhi kasam khai hai ki apna vote congress ko kabhi nahi dunga.

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  12. सर जी जो कहा हें उसे तों खुदा भी नही ठुकरा सकता ,,,जय जय राजस्थान ....जय हिंद सर ..to be contiune....

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  13. नाथूराम गोडसे great man

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  14. apne jagah pe gandhi ji bhi sahi hain aur nathu ji bhi ............

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  15. में आपके लेख से पूर्णतया सहमत हूँ. महान राष्ट्रभक्त गोडसे के बारे में नयी जानकारी मिली..उसके लिए धन्यवाद.
    गाँधी एक संत थे और उन्हें महात्मा की उपाधि कांग्रेस ने नहीं बल्कि एक महान राष्ट्र भक्त सुभाष चन्द्र बोस ने दी थी, वे गाँधी जी का बहुत आदर करते थे पर उन्हें गाँधी का कभी समर्थन हासिल नहीं हुआ.
    मेरे विचार में गाँधी जी की वजह से ही देश ने एक वीर सपूत को खो दिया (बोस) और एक काले अँगरेज़ (नेहरु) को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला.
    यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता हे की ऐसे अँगरेज़ परस्त और देशद्रोही लोग आज़ादी के बाद सत्ता में आये और आज भी देश में ऐसे ही लोगों की मानी जाती हे.
    आज देश को संपूर्ण क्रांति की जरूरत हे ताकि सता में केवल देशभक्त लोग ही आयें. वन्देमातरम.

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  16. aap mein koi kami nahi kami hum yuva varg mein hai jo hum congress sarkar dwara kahi gayi har baat ko maan lete hai aur gandhi ji jasie neta ko naman karne chal padte hai ye ekdaum glat hai naman karna hai to neta ji subash ko karo , nathuram godse ko karo jo desh heet or partibha ka dhani tha desh bhagat tha meri bhagwan se prarthna hai ki mein sdev sabhi desh bhagat or sahido ko hamesa naman karta raho aur kabhi bhi meri juban se gandhi mohandsad karmachand gandhi or indira gandhi or pandit jwaharlal nehru jaise netao k naam bhool kar bhi meri juban par na aaye . inqlab zindabad , vande matram , jai hind

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  17. आप में कोई कमी नहीं कमी हम युवा वर्ग में है जो हम कांग्रेस सर्कार द्वारा कही गयी हर बात को मान लेते है और गंधi जी जसी नेता को नमन करने चल पड़ते है ये एकदुम गलत है नमन करना है तो नेता जी सुबाश को करो , नाथुराम गोडसे को करो जो देश हीत और परतिभा का धनि था देश भगत था मेरी भगवन से प्रार्थना है कि में सदेव सभी देश भगत और सहिदो को हमेसा नमन करता रहो और कभी भी मेरी जुबान से गाँधी मोहन्दाद करमचंद गाँधी और इंदिरा गाँधी और पंडित जवाहरलाल नेहरु जैसे नेताओ क नाम भूल कर भी मेरी जुबान पर न आये . इन्कलाब जिंदाबाद , वन्दे मातरम , जय हिंद

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  18. aap kaun ho kya ho ye mai nahi jaanta par mai itna jaanta hoon ki jo log musalmano ko gaali dete hai ya phir bura samajhte hai woh ye bhool jaate hai ki aaj jo hum azaadi ki saans le rahe hai us azaadi k liye na jaane kitne musalmaano ka khoon baha hai jung e azaadi k liye dewband aur na jaane kitne madarso se british force k khilaaf fatwe de gaye na jaane kitne maulano ko sare aam phansi di gayi aaj ki jo nau jawan phidi kuch muslim naam jaanti jabki haqeeqat na jaane kitne aise musalmaan hai jo is mulq k liye saheed hue aur unko koi jaanta nahi shayad aap logo ko ye maaloom nahi k jai hind nara ek muslim aadmi ne diya jo merath uttar pradesh ka rahne wala tha uska naam aabid tha musalmaan pahle bhi is mulq k liye wafadaar tha aaj bhi desh par koi aanch aayegi to sabse pahle musalmaan aage hoga kyuki jo musalmaan hoga usko maloom hai pahle desh baad mein mazhab .... jai hind

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  19. @ शिवम जी आपने वीर श्री नाथूराम जी गोडसे को केवल एक हत्यारा बताया ? क्या आपने नाथूराम गोडसे जी के जीवन चरित्र को गहराई से जान लिया है , क्या आप जानते है कि गोडसे जी बाल्यकाल से ही योगनिष्ठ , समाजसेवी और सच्चे समाजसुधारक तथा क्रान्तिकारी विचारों वाले ' हिन्दू राष्ट्र ' समाचार पत्र के यशस्वी संपादक और अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा थे । श्रीनाथूरामजी गोडसे का अस्थिकलश आज भी पुणे में उनके घर पर रखा हुआ है जो उनके स्वप्न के पूर्ण होने की अर्थात भारत के पुनः अखण्ड होने की बाट देख रहा है ।
    श्रीगोडसेजी के जीवन चरित्र की संक्षिप्त जानकारी के लिए इसी ब्लॉग पर " वीर महात्मा नाथूराम गोडसे " शीर्षक से लिखा गया लेख पढ़ा जा सकता है ।

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  20. @ बेनामी जी भारत की आजादी में मुसलमानों का योगदान न भुलाया गया है , न भुलाया जा रहा है और न ही भुलाया जा सकता है । इब्राहीम गारदी और अश्फाक उल्ला खाँ जैसे राष्ट्रभक्तों पर हमें सदा गर्व रहा है और रहेगा । आज भी हमारे आदर्श एक भारतीय मुस्लिम परिवार में जन्में डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम है । लेकिन जो अरब साम्राज्यवादी , देशविभाजक , कट्टर जेहादी तत्व है , मैं उनका विरोधी था , हूँ और रहूँगा ।
    मैंने भारतीय मुस्लिम समाज के राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य को लेकर इसी ब्लॉग पर " भारतीय मुस्लिम समाज के नाम एक अनुरोध " शीर्षक से एक लेख लिखा है , उसे पढें और अपने विचारों से अवगत कराये ।
    वन्दे मातरम्

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  21. @ शिवम जी श्रीनाथूरामजी गोडसे के जीवन चरित्र विषयक लेख का शीर्षक शुद्ध कर लें , सही शीर्षक है " वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण " ।

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  22. koi kuch bhi kahe hakikat hakikat rahegi

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  23. jo hua sahi hua jis ne kiya wo sahi kiya

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  24. नथुराम गोडसे हिंदू धर्म के कार्न्तिकारी थे उन्हे बदनाम मत करो शिवम

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  25. vikas YMI, mai nhi janta tu kya h. tu gandi ka chmcha or deshdari hai. TU VMI hai to mai PKI hu matalb PARVEEN KUMAR INDIAN. apne hath smbal kr likha kr. anyatha muh INDIAN ko tu janta hi h kya kar skte hai.

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  26. the truth is sir nathuram godse done good jobe and i really hate congress since rajivgandhi tym am just 8 yr old but i dont lyk thinking of congress one more thing sahid bhagat sing is real hero not gandhi britishers left dt country coz of they not abel to handel big country after world war 2 so i dont think so mahatma plyed a role for india they do many more things but he is the guy hu plant kashimr problm he is the guy my real selut to mr nathu ram godse

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  27. ye bhart ka durbhagya hai ki jo sache desh bhagat the wo mar gye ya mar diye gye or jo dust the wo bach gye

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  28. GODSE JI EK DESHBHAKT THE JINKO NEHRRU & GANDHI FAMILY NE BADNAM KIYA
    JAI HIND

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  29. nehru aur gandhi bharat ke liye ek shrap the jiske parinam swaroop congress ka uday hua aur isna parinam bhrat ab tak bhugat raha h aur na jane kab tak bhugtega....parantu kuch yuva jo ki khud ko gandhivadi ya samajhdar mante h ve log vastvikta se dur bhagte h
    bhagwan se prarthna h ki in samajhdaro ko sadduddhi de

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  30. pandit ji jaisa deshbhakt aur koi nahi ho sakta

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  31. Rashtrapita gandhi nasti apitu Godseji asti, HAMARE RASTRAPITA.

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  32. Salikant ji मैं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ , मानता हूं कि श्रीगोडसेजी ने गांधी जी को मुक्ति प्रदान कर देश को ओर अधिक हानि होने से बचा लिया और आत्मबलिदान देकर भारत के इतिहास में अमर हो गये । लेकिन भारत एक सनातन राष्ट्र है , यहाँ कि संस्कृति अरबों वर्ष पुरानी है तथा हम मातृभूमि को माता एवं अपने आप को उसका पुत्र मानते है तो फिर कोई भी इसका पिता कैसे हो सकता है ! इस विषय में अधिक जानकारी के लिए इसी ब्लॉग पर " क्या गांधी जी राष्ट्रपिता है ? " शीर्षक से लिखा गया लेख पढ़ा जा सकता है ।

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  33. sabse pahele mai bharat ke mathe ke tilak nathuram godse ko naman karta hu aur sabko ye bata dena chahta hu ki ,,nehru/gandhi/indira sab apne swarth ke leye mare, lekin subash chandra boss nathu ram ye sacche rastriya bhakt the..jay hind.

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  34. गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !

    गांधीजी भारत आये उसके बाद उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को किया गया। पूना में गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था। गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये। हत्या का यह प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है। 1934 में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल ही कहा! से पैदा होता ?

    गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 में पंचगनी में किया गया। जुलाई 1944 में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया। मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए इन्कार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गांधीजी की तरफ लपका। पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड लिया। पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जा!च करने वाले कपूर-कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम इस घटना पर अपना बयान देते समय लिया था। भीलारे गुरुजी अभी जिन्दा हैं। 1944 में तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका खुद मुहम्मद अली जिन्ना को भी भरोसा नहीं था। ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि 1946 तक मुहम्मद अली जिन्ना प्रस्तावित पाकिस्तान का उपयोग सना में अधिक भागीदारी हासिल करने के लिए ही करते रहे थे। जब पाकिस्तान का नामोनिशान भी नहीं था, तब क्यों नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या का प्रयास किया था ?

    गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी वर्ष सितम्बर में, वर्धा में, किया गया था। गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी बम्बई न जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहु!चा। उसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था। उस गुट के ग.ल. थने के नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ था। यह बात पुलिस-रिपोर्ट में दर्ज है। यह छुरा गांधीजी की मोटर के टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था, ऐसा बयान थने ने अपने बचाव में दिया था। इस घटना के सम्बन्ध में प्यारेलाल (म.गांधी के सचिव) ने लिखा है : 'आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उसके बीच अकेला जा।!गा और वर्धा 1रेलवे स्टेशन1 तक पैदल चलू!गा, स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है। कृबापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।

    धरना देनेवालों का नेता बहुत ही उनेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला। (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)

    इस प्रकार प्रदर्शनकारी स्वयंसेवकों की यह योजना विफल हुई। 1944 के सितम्बर में भी पाकिस्तान की बात उतनी दूर थी, जितनी जुलाई में थी।

    गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया था। गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच में रेल पटरी पर बडा पत्थर रखा गया था। उस रात को डांइवर की सूझ-बूझ के कारण गांधीजी बच गये। दूसरे दिन, 30 जून की प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मु!ह से सकुशल वापस आया हू!। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहु!चाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया।'

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  35. नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणील् नाम की मराठी पत्रिका निकालता था। गांधीजी की 125 वर्ष जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद 'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर जीने कौन देगा ?' यानी कि 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा ? गांधीजी की हत्या से डेढ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह कथन साबित करता है कि वे गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे। 'अग्रणी' का यह अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है। 1946 के जून में पाकिस्तान बन जाने की शक्यता तो दिखायी देने लगी थी, परन्तु 55 करोड रुपयों का तो उस समय कोई प्रश्न ही नहीं था। इसके बाद 20 जनवरी, 1948 को मदनलाल पाहवा ने गांधीजी पर, प्रार्थनागसभा में, बम फेंका और 30 जनवरी, 1948 के दिन नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।

    55 करोड रुपयों के बारे में एक और हकीकत भी समझ लेना जरूरी है। देशगविभाजन के बाद भारत सरकार की कुल सम्पनि और नकद रकमों का, जनसंख्या के आधार पर, बटवारा किया गया था। उसके अनुसार पाकिस्तान को कुल 75 करोड रुपये देना तय था। उसमें से 20 करोड रुपये दे दिये गये थे। और, 55 करोड रुपये देना अभी बाकी था। कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तान को यदि 55 करोड रुपये दिये गये, तो उसे वह सेना के लिए खर्च करेगा, यह कहकर 55 करोड रुपये भारत सरकार ने रोक लिए थे। लार्ड माउण्ट बेटन का कहना था कि यह रकम पाकिस्तान की है, अतः उन्हें दे दी जानी चाहिए। इस बात की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने 55 करोड रुपये पाकिस्तान को दे देने की माउण्ट बेटन की बात का समर्थन किया। 12 जनवरी को गांधीजी ने प्रार्थना-सभा में अपने उपवास की घोषणा की थी, और उसी दिन 55 करोड रुपये की बात भी उठी थी। लेकिन गांधीजी का उपवास 55 करोड रुपये के लिए नहीं, दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए था।

    जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में एक मौलाना ने आकर गांधीजी से कहा था कि पाकिस्तान का विरोध करने वाले हमारे जैसे राष्टंवादी मुसलमान पाकिस्तान जा नहीं सकते, और हिन्दू सम्प्रदायवादी हमें यहा! जीने नहीं देते। हमारे लिए तो यहा! नरक से भी बदतर स्थिति है। आप कलकना में उपवास कर सकते हैं, पर दिल्ली में नहीं करते ? ऐसी शिकायत भी उस मौलाना ने गांधीजी से की थी। गांधीजी मौलाना की बात सुनकर दुखी हो गये थे। दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए अनेक प्रयास होने के बावजूद शान्ति स्थापित नहीं हुई। अन्त में 13 जनवरी से गांधीजी ने उपवास आरम्भ कर दिया। यह उपवास साम्प्रदायिक शान्ति के लिए था, न कि 55 करोड रुपयों के लिए। 55 करोड रुपयों का सवाल तो संयोगवश उसी समय प्रस्तुत हो गया था। गांधीजी ने अपनी प्रार्थना-सभा में उपवास का हेतु स्पष्ट रूप से घोषित किया था और उसके बाद उनका उपवास समाप्त कराने के लिए हिन्दुत्ववादियों सहित तमाम सम्बन्धित पक्षों ने शान्ति की अपील पर हस्ताक्षर किये थे। इसके बावजूद भी हिन्दुत्ववादी झूठे प्रचार करते जा रहे हैं।

    गांधीजी की हत्या करने वाले यह दावा करते हैं कि 55 करोड रुपये की घटना से उनेजित होकर गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया था। इसका अर्थ तो यह होता है कि यह षड्यंत्र 13 जनवरी के बाद रचा गया था। तो क्या मात्र सात दिनों में, गांधीजी पर बम फेंकने की घटना उस जमाने में सम्भव हो सकती थी ? मात्र 17 दिनों में ही हत्या करनेवाले इकट्ठे हो गये, षड्यंत्र रच लिया, ग्वालियर से पिस्तौल हासिल करके दिल्ली आये और गांधीजी की हत्या कर दी। इतने कम समय में षड्यंत्र रच लिया गया उस पर अमल भी हो गया, यह बात गले से नीचे उतरने लायक नहीं। 13 जनवरी को नाथूराम ने अपनी बीमे की पालिसी नाना आप्टे की पत्नी के नाम करा दी थी। अदालत ने भी अपने फैसले में 1 जनवरी, 1948 को षड्यंत्र-रचने का दिन माना है। कुछ क्षणों के लिए उनकी बात मान भी लें तो 55 करोड रुपयों का सवाल सामने आया उसके पहले से ही, गांधीजी की हत्या करने के प्रयास क्यों किये जाते रहे, यह प्रश्न अनुनरित ही रह जाता है। एक घटना को छोडकर, बाकी सभी प्रयास महाराष्टं में, और पूना के ही हिन्दुत्ववादियों द्वारा क्यों किये गये ? तीन प्रयास तो खुद नाथूराम गोडसे ने किये। इस तरह जाहिर है कि 55 करोड रुपये की बात तो बिलकुल झूठ है।

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  36. ऐसे होते हैं देशभक्त

    गांधी की हत्या के साथ 55 करोड रुपयों का कोई सम्बन्ध नहीं हैं, इस बात की स्पष्टता के बाद अब हिन्दुत्ववादियों द्वारा प्रस्थापित तीसरे, 'मिथ' की भी चर्चा कर लें। यह तीसरा, 'मिथ' है कि गांधीजी के हत्यारे प्रामाणिक देशभक्त और बहादूर थे। जैसा कि इनके द्वारा प्रचारित किया जाता है। 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक में नाथूराम की ऐसी ही छवि उभारने की कोशिश की गयी है। जो लोग असत्य तथा अर्धसत्य का सहारा लेते हैं क्या उनको प्रामाणिक और बहादुर कहा जा सकता है ? जो लोग सन्दर्भ को तोड-मरोड कर झूठ फैलाते हैं उनको बदमाश कहते हैं या बहादूर ? इन लोगों ने गांधीजी की हत्या का असली कारण बताने का साहस किया होता तो जरूर उनको प्रामाणिक कहा जा सकता था। गांधीजी की हत्या के लिए किये गये पिछले निष्फल प्रयासों की जिम्मेदारी भी कबूल की होती, तो भी कुछ भिन्न बात होती। एक अहिंसानिष्ठ निःशस्त्र व्यक्ति की हत्या करना कोई मर्दानगी नहीं, कोरी नपुंसकता है। जो लोग तार्किक रीति से अपनी बात दूसरों को समझा नहीं सकते, वे ही लोग हिंसा का सहारा लेते हैं। हिंसा बुजदिलों का मार्ग है, शूरवीरों का नहीं। अपनी निष्फलता और हताशा में ही हिन्दुत्ववादियों ने गांधीजी की हत्या की थी। नाथूराम ने गांधीजी की हत्या करने के प्रयास अधिकतर प्रार्थना-सभाओं में ही किये। जब सब लोग प्रार्थना में लीन हों, उस वक्त ये 'नरबा!कुरे' गांधीजी की हत्या करना चाहते थे। पूजा-प्रार्थना कर रहे आदमी पर हमला नहीं करना चाहिए, ऐसा हिन्दुत्ववादियों के प्रिय हिन्दू-युद्ध शास्त्र में कहा गया है। ये नामर्द तो अपनी संस्कृति का भी अनुसरण नहीं कर सकते। हजारों लोगों की उपस्थिति वाली, गांधीजी की प्रार्थना-सभा में बम फेंकने में भी इन लोगों को शर्म नहीं आयी। जिन लोगों के लिए निर्दोष व्यक्तियों की जान की कोई कीमत नहीं, उनको क्या प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ?

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  37. भारतीय राजनीति में हिन्दुत्ववादी तो मूर्ख-शिरोमणि थे। गांधीजी की हत्या करके उन्होंने अपने ही पा!व पर कुल्हाडी मारी थी। गांधीजी की हत्या के साथ ही साम्प्रदायिक दंगे बन्द नहीं हुए होते, और उस स्थिति में हिन्दुत्ववादियों को शक्ति बढाने का मौका मिला होता। देश का साम्प्रदायिक विभाजन और साम्प्रदायिक ताकतों का ध्रुवीकरण हुआ होता तो शायद भारत में सेक्यूलर संविधान और सेक्यूलर राज्य अस्तित्व में नहीं आया होता। गांधीजी ने तो अपने प्राणों की आहुति देकर भी देश की सेवा की, जबकि मूर्ख हिन्दुत्ववादियों ने महात्मा के प्राण लेकर अपने ही ध्येय को नुकसान पहचाया।
    यह है गांधीगहत्या की वस्तुस्थिति। जैसे कि प्रारम्भ में ही कहा है कि नाथूराम गोडसे धर्म-जनूनी था, पागल नहीं। ठण्डे कलेजे से, षड्यंत्र रचकर उसने गांधीजी की हत्या की थी। दूसरी बात कि, गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये और मुसलमानों के प्रति उनके पक्षपाती रवैये के कारण नहीं, हताशा और ईर्ष्या के कारण की गयी थी। गांधीजी जब तक जीवित हैं तब तक अपना कुछ चलने वाला नहीं है, यह हकीकत उन्हें परेशान करती थी। इसी कारण कुछ लोग उन्हें गालिया! देते थे, कुछ लोग मौका देखकर तोडफोड करते थे, तो कुछ लोग उनकी हत्या करने का प्रयास करते थे। तीसरी बात कि, ये लोग प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त नहीं थे। काले-कारनामे करने वालों, झूठ फैलाने वालों, गन्दी शरारतें करने वालों तथा प्रार्थना करते हुए निःशस्त्र व्यक्ति की हत्या करने वालों को प्रामाणिक, बहादुर, देशप्रेमी तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। झूठगफरेब और षड्यंत्र साम्प्रदायिकता की राजनीति के अनिवार्य अंग हैं। साजिश करके ही इन्होंने सन् 1948 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद में रामलीला की तसवीर रखवायी थी, षड्यंत्र करके ही मस्जिद तोडी गयी और अब मन्दिर बनाने की भी साजिश कर रहे हैं। देशप्रेम की चादर ओढे, हमारे आसपास घूमनेवाले, इन विकृत-कुण्ठित-मानस के षड्यंत्रकारियों को हमें अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए।

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  38. धन्य-धन्य हो गांधी बापू धन्य तेरी कुरबानी।

    हो धन्य तेरी कुरबानी।

    भूल नहीं सकती है दुनिया तेरी अमर कहानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    यह तेरा ही खून नहीं है मानवता का।

    खून अमन का आजादी का दुखियारी जनता का।

    सबके मुख पर आ!सू हैं सबके मुख पर वीरानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    हम सब तेरे कातिल हैं हम खूनी तेरे बापू।

    पाप कभी यह धो न सकेंगे सारी कौम के आ!सू।

    दाग कभी यह धो न सकेगा गंगा का भी पानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    तूने सीना तान के शाही ताकत को ललकारा।

    'छोडो भारत' 'छोडो भारत' गज उठा था नारा।

    जेलों में बन गयी बुढापा तेरी वीर जवानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    तू अ!धियारे भारत में उजियारा बनकर आया।

    घर-घर जाकर तूने आजादी का दिया जलाया।

    तुझसे ही हमने अपनी यह कीमत है पहचानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    तेरी कीमत पूछे कोई आज वह नोआखाली से।

    कैसा फूल है टूटा अपने गुलशन की डाली से।

    तूने सबका सुख-दुख बा!टा सबकी पीडा जानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    जलती आग में कूद के तूने फूटकी आग बुझाई।

    अपनी जान ग!वाकर लाखों की जान बचाई।

    आखिर सच की जीत हुई और हार झूठ ने मानी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

    अमर रहेगा अमर रहेगा मौत से जो लडता है।

    आजादी के नाम पे मरने वाला कब करता है ?

    जब तक दुनिया है गजेगी तेरी अमृत वाणी।

    धन्य-धन्य हो गांधी बापू.....

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  39. nathuram godse ek bahut mahan desh bhakt insan the .unhone gandhi ki hatya karke hinduo aur hindustan par bahut bada ahasan kiya hai. desh bhakto ko to angrajo ki aulad nehru aur uske sathio ne pahle hi marva diya tha.nehru aur gandhi ne is desh ko baebad karke rak diya. in dono angrejo ke ajent ne desh ke do tukde karr diye. lakho hindu ki hatya hui aur aur ek islami atankwadi desh ka nirman ho gya. jiski saja ham hinduo ko ajtak milti rahi hai. pure desh mai jagah2 hinduo ki hatyaaho rahi hai.is congras gaddar parti muslmano ko kush karne ke liye sadu santo atank wadi banakar un par atyachar aur julm ki sari hade par kar di hai.sadhu santo ki hATYA KI JA RAHI HAI.SACHE HINDO KA KASSOR SIRF ITNA HAI KI APNE DHARM KO BACHANE KE LIYE AWAZ UTAHATE HAE TO UNKI HATYA KARDI JATI HAI YA UNHE JAIL ME DAL DIYA JATA.

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  40. ये मादरचोद योगेश क्या उस उल्लू के पठ्ठे नालायक गाँधी कि नाजायज औलाद है क्या?

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  41. main nahi jaanti ki satya kya hai,,, hindu, muslim , sikh , isaai,, sab ek hi hain,, haan lekin aaj jise hum bharat ki bhumi bhaarat kehte hain uske mukhya dharma yaani ki sanatan dharama kahin vilupt sa ho rha hai aur ek hindu hone ke kaaran vash main aahat ho rhi hun.. mera bhaarat to jaise kahin kho sa gaya hai,,, apne hi desh me rehkar aaj hindu se jyada muslims ko maanyata mil rhi hai,, manushya kabhi acche karam karta hai to kabhi bure.. dono hi ( gandhi aur godse ) ne apna apna karam kiya,, aur vaastav me satya kya hai wo to parampita parmeshwar hi jaanta hai.. hum to aaj ke yug ke hain jo pustakon me milta hai hum wahi keh daalte hain kabhi

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  42. 30 जनवरी सन् 1948 ई. की शाम को जब गाँधी जी एक प्रार्थना सभा में भाग लेने जा रहे थे, तब राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर मोहनदास गाँधी का वध कर दिया था । नाथूराम गोडसे ने मोहनदास गाँधी के वध करने के 150 कारण न्यायालय के सामने बताये थे। नाथूराम गोडसे ने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वे अपने बयानों को पढ़कर सुनाना चाहते है और उन्होंने वो 150 बयान माइक पर पढ़कर सुनाए थे। उनमे से कुछ प्रमुख कारण ये थे -

    1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी जी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया। इसके बाद जब उधम सिंह ने जर्नल डायर की हत्या इंग्लैण्ड में की तो, गाँधी ने उधम सिंह को एक पागल उन्मादी व्यक्ति कहा, और उन्होंने अंग्रेजों से आग्रह किया की इस हत्या के बाद उनके राजनातिक संबंधों में कोई समस्या नहीं आनी चाहिए |

    2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी जी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी जी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

    3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी जी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

    4. मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी जी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी जी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

    5. 1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी जी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

    6. गान्धी जी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

    7. गान्धी जी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को कश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

    8. यह गान्धी जी ही थे, जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

    9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी जी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

    10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी जी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

    11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव

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  43. सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी जी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

    12. 14-15 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी जी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

    13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी जी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

    14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

    15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी जी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

    16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण को देखते हुए, यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी जी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
    17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया।

    18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया, जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है.

    19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा. फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया. और वो हिंदू - गाँधी मरता है तो मरने दो - के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे. रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर. सुप्रीम कोर्ट. फॉर गाँधी वध क्यो ?

    २०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।

    उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता।

    उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे ने गान्धी का वध कर दिया। न्यायलय में गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा- "नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन मौजूद आम लोगों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।"

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